Tuesday, August 10, 2010

MRIGTRISHNA

मृगतृष्णा
परदेश मै रहकर देश की मिटटी सुनहरी लगती है
रेगिस्तान मै कंटीली झाड़ी न्यारी लगती है
शहर मै आकर गाँव की गलियां प्यारी लगती है
गाँव मै रहकर शहर की लडकिया सुक्मारी लगती है
बूढ़े पेढ़ को अपनी जड़े प्यारी लगती है

होती है कमी जब तक किसी चीज की
वो तब तक ही प्यारी लगती है
मिल जाती है जब वोही चीज तो
अपनी चाहत बेमानी लगती है
भागते भागते इस मृगतृष्णा के पीछे
इंसान को अपनी जिन्दगी गवानी पडती है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Sunday, August 8, 2010

JEEVAN (LIFE)

जीवन
हुआ पैदा मै जब तो कहा मेरे पिता ने
बड़ी देर लगा दी यार
बहुत कराया तुने इंतज़ार
आया  तू चार लडकियों के बाद
कुछ मजा नही आया

गया स्कूल मै जब मिला टीचर से
नही दी कोई donation और
टेस्ट में मै  होगया पास
कहा टीचर ने  दाखिला तो मिल गया यार
पर मजा नहीं आया

गया कॉलेज में मिला लडकियों से
कहा उन्होंने देखने में हो ठीक ठाक
पर हो  किसी रईस की नही औलाद
मगर चलो बैठो हमारे पास
पर मजा नही आया

गया जब करने नौकरी
तो कहा बास ने कुछ कर के दिखाओ
मेहनत  तो खूब की पर उपर से कुछ नही किया
हो गया बास नाराज और
कहने लगा ये बात
की मजा नही आया

हुई शादी उसके बाद आई बीवी घर में
लाई दो बड़ी बहनों की नसीहत अपने साथ
चाहती थी वो तीनो की सुनु मै  उनकी बात
नही दिया अपने घर का रिमोट जब उनके हाथ
तो बोली तीनो एक साथ की
मजा नही आया

जब तक थे जिन्दा माँ बाप
रखना था उनको हमारे साथ
सब बहने सुनती रही हमारी बात
जाते ही उनके मचा दी बन्दर बाँट
जब बाद कर्तव्य के मैंने मांगे अपने अधिकार
तो लगी कहने सब एक ही बात
की मजा नही आया

हुआ बेटा घर में मेरे बहुत दिया लाढ प्यार
जब तक था पैसा मेरे पास
करता रहा उसकी पूरी हर मांग
तब तक था वो मेरे साथ
फिर जब बदले हालात और हो गया मै बेकार
फिर बन गया मै भार और वो होगया माँ के साथ
और बोला की मजा नही आया

अब कर रहा हूँ मै टाइम पास
कर रहा हूँ इन्तजार की कब जाऊंगा मै
इस दुनिया से पार अपने भगवान के पास
करूँगा शुक्रिया उनका की
चाहे हुआ मै परेशान पर  बतादी आपने
मुझे   इन सांसारिक रिश्तो की औकात
 बस बास मजा आ गया II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

Saturday, August 7, 2010

SOCH APNI (YOUR OWN THINKING)

सोच अपनी

जो नहीं है वो
बनने की कोशिश मत कर
क्या कहेगा जमाना
इस बात की फ़िक्र मत कर

कर ले तू चाहे कुछ भी,
जमाने में साबित तू खुद को बड़ा नही कर पायेगा
पाते ही मौका पहला
जमाना तुझको तेरी औकात बता जायेगा

किसकी नजर में तू होना चाहता है बड़ा
ये जमाना तो खुद दिल से बहुत छोटा है
ये क्या नापेगा ऊंचाई तेरी
ये तो खुद ही नजर का खोटा है

 जीना चाहता है यहाँ अगर तू
इस समाज के उलाहनो की परवाह तू मत कर
इससे पहले की कोई उठाये कोई ऊँगली तुझ पर
कर दे तू शर्मिंदा इनको, असलियत इनकी बताकर

हूँ मै परेशान इस बात से की
खुद है सने जो कीचड़ में
वो हमारे कपड़ो से धूल उड़ाते है
बड़ी बेशर्मी से बदल कर कपडे अपने
फिर समाज के ठेकेदार बन जाते है

बदलकर सोच अपनी
कही तू साथ जमाने के बह मत जाना
बदल दे तू धारा इसकी
ताकि करे  सलाम तुझे ये जमाना II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

 

Monday, August 2, 2010

RASHTAR MANDAL KHEL (COMMON WEALTH GAMES)

राष्ट्र मंडल खेल


कह गए ऋषि मुनि हमारे
जीवन है खेल तमाशा
ऐसे है नेता हमारे कर दिया संधि विच्छेद उसका
और बना दिया खेल को एक तमाशा


स्वर्ण पदक तो मिलेगे खिलाडियों को
बाद करने के मशकत खेल के मैदान में
मगर इन्होने तो मैदान बनने से पहले ही
सोने की खान को लूट लिया


मगर है तारीफ़ इनकी की
इन्होने पांड्वो के सिदान्त को भी मान लिया
जिस की जितनी औकात थी उसको
उतना सोना बाँट दिया


किसी ने स्टेडियम में खाया
किसी ने मकान में खाया
और कोई सड़के बनाकर खा रहा है
किसी को कुछ नही मिला तो वो
बिना मजदूर के नालिया साफ़ करा रहा है


है त्रस्त जनता इस बढती हुई महंगाई से
है परेशान खिलाडी नेताओ के
 निकम्मे खिलाडी जवाई से


मगर है कहते खेल मंत्री की वो चुप रहेंगे
बचायेंगे देश को रुस्बाई से और
खेलो के अंत तक सब यूँही सहेंगे


बाद खेलो के वो अपना मुंह खोलेंगे
बैठाकर आयोग वो सचाई को तोलेंगे


वो आयोग एक के बाद एक तारीख देता जायेगा
और बोफोर्स, ताबूत और चारा घोटाले की तरह
ये भी इतिहास की परतों में दफन हो जायेगा II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

DORAHA (TURNING)

दोराहा
तुम जियो क्योंकि तुम में जीने कि चाह है
तुम चलो अपनी राह पर क्योंकि
 तुम्हारे पास चलने को राह है
छोढ़ दो मुझे मेरे हाल पर क्योंकि
बहुत थक गया हूँ मै

वो वक़्त भी था कभी कि
चलते थे हम चार कदम आगे तुमसे
दोड़ते थे हम तेजी से इतनी कि
रह जाती थी पीछे तुम लड़खड़ाकर 

बढ़ा देते थे रुककर हम हाथ मदद का
कभी सोचा नही था हमने कि
कर देती हो दूर मंजिल हमारी
अपनी धीमी चाल से  

आज जब वक़्त के काँटों ने चुभकर
है कर दिया लहू लुहान पैरो को हमारे
और निकल गयी चंद कदम आगे हमसे
तो देखती हो मुडकर हमको
अपनी इस व्यंग भरी मुस्कान से

शायद तुमने कभी हमे समझने कि कोशिश नही कि
शायद जो बढाया हाथ हमने मदद का
उसे तुम अपना अपमान समझ बैठी
हमने तो कभी अपना बढ़पन दिखाया नही
पर तुम जाने कब खुद को छोटा समझ बैठी

अगर जिन्दगी के इस दोराहे परछोडकर अकेला
 हमे तुम अपनी राहे करना चाहती हो अलग
 तो बेशक कर लो शायद
उससे ही दूर हो जाये छोटेपन का एहसास तुम्हारा

देना कोई सफाई हमारी फितरत नहीं
समझो हमारी भावनाओ को
समझी इस बात कि कभी तुमने जरूरत नहीं
जब  नहीं समझी तब   तो  अब  हमे  क्या  समझ पायोगी
पढता है फर्क क्या अगर छोडकर हमे अकेला तुम आगे चली जाओगी

पड़ गयी है आदत हमे तो
रहकर साथ तुम्हारे फिर भी अकेला रहने की
मगर जब जब बदलेगा मौसम
तब खुद को बहुत अकेला तुम पाओगी

घबरा जाती हो तुम तो जरा सी तन्हाई से
क्या करोगी तुम जब आयेगे दोराहे फिर
क्या  इतनी ही गहराई से
फैसले तुम अकेले ले पाओगी

शायद कभी तुम समझ पाओ कि
महत्व इस बात का नहीं है कि
राह में कौन आगे चलता है
और कौन पीछे चलता है

आवयश्क यह है कि राह में हो एक हमसफर
बनने को हमसफर सिर्फ एक राह पर चलना ही काफी नही
जरूरी है कि हो हमसफर में
भावना विश्वास और समर्पण की

न जाने तुम यह बात
कभी समझ भी पाओगी या नही पाओगी
या फिर करके राह अपनी अलग
हमें यो ही नितांत अकेला छोड़ जाओगी II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

 

Sunday, August 1, 2010

ADHURE LOG (INCOMPLETE PEOPLE)

अधूरे लोग 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 
सब के होते हुए भी पास 
वो दिल से सदा सूने रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 

जब चाहते है वो किसी को 
तो चाहते है इतनी चाहत से
की सामने वाला भी उस चाहत से घबरा जाता है 
वो नहीं पता समझ की 
है वो काबिल उस चाहत के या नहीं 
इसी उलझन में वो खुद को दोराहे पर पाता है
 चाहतो के सफर में वो 
अपने सपनो से जुडे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 

वो रहते है अधूरे क्योंकि 
उन्हें समय पर कुछ नही मिलता 
उन्हें मिलता है जब उनमे 
उसे पाने की चाह नही रहती 
रोते है अरमान उनके 
पर जुबान बेवफा कुछ नही कहती 
उनके साथ यह सब  होता है क्योंकि वो
अपने से परायो से घिरे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है

जब नहीं दिया तुमने हमें अपना अधूरापन
तब हम तुमे अपना अधूरापन कैसे भरने देते
तुमने तो अपना अधूरापन बाँट दिया कइयो में
पर तुम कभी हमारे दिल के दरवाजे से हटी ही नही 
तो किसी को हम अपने दिल में प्रवेश कैसे करने कैसे देते 

शायद तुम तो जीना चाहती थी सिर्फ खुद के लिए
मगर हम तो सिर्फ तुम्हारे साथ थे जीना चाहते 
इस बात को शायद जानती थी तुम
इसीलिए चाहती थी की भर दूँ मै सूनापन तुम्हारा
क्योंकि समझती थी तुम
 कि  चाहे हो जाए तन्हा कितने भी हम
 पर तुमसे शिकवे का कभी कोई शब्द भी न कहते 

मगर ये तो हद है हमारी दीवानगी की 
 या तो हम रहते  है तुम्हारे साथ 
या फिर अपनी चाहतो के साथ रहते  है 
हम अकेले ही संजीदगी से 
अपने सपनो से जुड़े तन्हा बैठे रहते  है 
करते है बाते सिर्फ तुम्हारे साथ 
और नादान दिल को ये समझाते है  

कि है आश्चर्य कितना होते है दीवाने ऐसे भी  
जो रहकर भी अकेले  मस्त इतने रहते है 
कि अपनी मुहब्ब्त कि अपूर्णता में भी इतने पूरे रहते है 
नही करते अपने महबूब से वो शिकवा बेवफाई का 
उस बेवफा की पूर्णता में ही अपने अधूरेपन को भी भूले रहते है
शायद इसीलिए कुछ लोग अधूरे रहकर भी खुद में पूरे रहते है
और नादान जमाने की  नजर मै वो लोग हमेशा अधूरे रहते है II 
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

Wednesday, July 28, 2010

PRGATI (PROGRESS)

प्रगति

क्या वास्तव में की है प्रगति मानव ने
क्यों ऐसी प्रगति की मानव ने
क्यां ऐसी प्रगति की ही जरूरत थी

होती है प्रगति शांति के लिए
होती है प्रगति ख़ुशी के लिए
होती है प्रगति ज्ञान के लिए

यह कैसी प्रगति है मानव की
हर कोई है परेशान
हर कोई है अशांत

यह कैसी चली है आंधी कामनाओ की
घूम रहा है हर कोई पागल सा
उठाए गठरी अपनी अधूरी कामनाओ की

अपनी आकान्शाओ की  
बनाली है रबढ़ मानव ने
जितनी खींचो उतनी खिचती चली जाती है

क्यों नहीं समझ पाते लोग
की इतना पाने के बाद भी
जब नहीं मिली शांति मन को तो
पाकर थोडा और वो शांति कैसे पा जायेगा

शांति पाने से नही शांति संतुष्टि से आती है
और संतुष्टि पाने से नही संतुष्टि शांति से आती है
संतुष्टि - शांति है पूरक एक दूजे की
और दोनों ज्ञान से आती है

होता है क्या ज्ञान और
अज्ञान ही ज्ञान का होता है जनक
क्योंकि अज्ञान दूर करने की चाह ही
ले जाती है  हमें पास पास ज्ञान के

किसी वस्तु का न समझ पाना ही
कर जाता है अशांत मनको
यह अशांति और असमर्थता देती है
जन्म ज्ञान प्राप्त करने की चाह को 

मन में रखकर यह चाह ज्ञान की
गुजरा है मानव जिन रास्तो से
उन रास्तो को ही तो विज्ञानं कहते है

क्या सही है वो रास्ते 
गुजर रहा है मानव जिनसे
पाने को ज्ञान अपनी उत्पति का

कही ऐसा तो नहीं की अपनी जननी प्रकृति से
पाने को ज्ञान अपनी उत्पति का
बजाय करने के सहयोग उससे
हम लड़ पड़े है उसी जननी से

वस्तुओ की भोतिकता तो
 हम जान लेगे विज्ञानं से
मगर जानना है कारण उत्पति का
तो हमे ज्ञान को पाना होगा

पहुँच कर ज्ञान तक ही
हम पा पाएंगे ख़ुशी को
असली ख़ुशी है वो
जिसके खोने का डर न हो

होती है ख़ुशी जब शांति हो संतुष्टि हो
यह सब होता है ज्ञान से
और आता है ज्ञान असली प्रगति से

पाने को वास्तविक शांति, संतुष्टि और ख़ुशी
आइये हम  बैठे, सोचे और समझकर
बढ़ाए कदम को असली प्रगति की और II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

   

FARK(DIFFERENCE)

फर्क

ये दर्द अगर बेगाने देते
तो शायद हम सह भी जाते,
मगर क्या करे ये दर्द तो दिए है अपनों ने
जिसे हम किसी से कह भी नही पाते

बाहर वाले तो देकर जख्म
फिर भी छोड़ देते है मगर
अपने आकर उसे कुरेदकर
उसमे नमक भर जाते है

अगर थामी होती  बढ़कर
 अपनों ने वक्त पर बांह हमारी
तो क्या मजाल थी
उस वक्त कि आंधी कि
हमारी खुशिया यू उढ़ा ले जाती

दर्प दम्ब और गर्व से भरे
वो अपने आये और
बताकर कुछ दोष हमारा
और कुछ दोष कर्मो का चले गए

कुछ तो इतने अपने थे कि
उन्होंने आने कि जहमत भी की  नही
वो खड़े रहे दूर और 
देखते रहे तमाशा हमारा 

वो तो करते रहे इंतजार की
हो जाये हम कमजोर कुछ और 
ताकि वो आये आंधी के  बाद में
और उजड़े कारवां को लूट ले

हम भी मानते है की है दोष हमारे कर्मो का
जो ऐसे लोग हमारे अपने हुए
होते जो अच्छे कर्म हमारे
तो इतने बेगाने क्यों हमारे अपने होते

बेगानों ने तो फिर कभी
गाहे बेगाहे दिखाई हमदर्दी हमसे
वो अपने तो पाते ही मौका
हमे हमारी औकात बताते चले गए

फर्क वाकई होता है
अपने अपने होते है बेगाने बेगाने होते है
बेगाने तो वक्त लेते है बनने में अपना
पर अपने तो एक पल में ही बेगाने हो जाते है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

Tuesday, July 27, 2010

BHULAVA (CONFUSION)

भुलावा
होता है मन जब खुश तो
चाहता है उड़ना इतना ऊँचा कि
हर ऊंचाई उसे छोटी लगती है

आती है जब जवानी
लगती है दुनिया इतनी हसीन
कि जिन्दगी बहुत छोटी लगती है

मिलती है कामयाबिया जब
तो लगता है कि कुछ नही मुश्किल
नजदीक हर मंजिल लगती है

मगर यह सचाई नही है जीवन कि
और जब खतम होती है
यह महफ़िल खुशियों की  

तब देखता है इन्सान कि
 दूर कितनी निकल आया हूँ मैं
तो लगता है कि कितनी बेमानी थी ये मस्ती

उपर से चमकती
चकाचोंध करती यह हसीन दुनिया
असल में ये कितनी बदरंग लगती है

जब जाती है गुजर जवानी तो आती है समझ 
सतरंगी इंद्र धनुष तो होता है सिर्फ आसमान में
असल में दुनिया उससे कितनी दूर पड़ती  है
जब टूटता है सपना
 तब पछताता है तूं कि 
बहुत देर से जागा तूं 

अरे ! ये तो छलावा था इंद्र धनुष 
बेकार ही हुआ पागल तूं  पीछे इसके
बेकार ही पीछे इसके भागा तूं 

लगाता  है हिसाब जब तो कहता है मन
बहुत कम पाने के लिए
बहुत कुछ पीछे छोढ़ आया तूं

अब नही होता मुमकिन
लौटना पीछे क्योंकि
बीते हुए कल में कोई जा नही सकता

केवल जीना है तुझे आज में
क्योंकि आने वाले कल को
तूं अभी पा नही सकता

कामयाबी या नाकामयाबी तो है भुलावा मन का
क्या लाया था और क्या ले जायेगा 
ये सब तो है छलावा मन का 

जो दीखता है जो पाया है तूने
यह सब तो बस यही रह जायेगा 
गुजर जायेगा कारवां गुबार देखता रह जायेगा 

इसीलिए तो कहता हूँ
कि मत भटक, जाग   
 उठ और उठके देख 

वरना रह जायेगा कहता कि 
पाछे पछताए होत क्या 
जब चिड़िया चुग गयी खेत II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    
 

Monday, July 26, 2010

RAH APNI APNI (OF OWN WAYS)

राह अपनी अपनी

क्यों मै बताउं तुमे
कि क्या तुमने किया
क्या तुम नही जानती कि
क्या तुमने किया

क्यों हो चाहती तुम कि
बताउं तुम्हे कि मै हूँ  तुमसे खफा
क्यों चाहती हो तुम कि दूं सफाई का मौका तुम्हे
और क्यों न हूँ मै तुमसे खफा

होना खफा या लेना सफाई तुमसे
होगा नए रिश्तो को देना अंजाम
जबकि मै हूँ पहले से ही
तुम्हारे हमारे रिश्तो से परेशान

तुम रही समझती कि
हम समझते कुछ नही
हम रहे समझाते खुद को
कि ऐसा कभी हो सकता नही

तुम हमारे पास रहकर  भी
 दूर रही हमारे दिल से
हमने तुम्हे दिल मै बसाकर
 भी दूर कर दिया खुद  से

तुम खड़ी खड़ी  भी रही
मुढ़ती  पीछे कि ओर
हम झुक नही सके और
बस खड़े खड़े तुम्हे देखते रहे

तुम रहे समझते कि
हम तुम्हे समझते नहीं
हम जानते थे कि तुम्हे
हम जानकर भी जानना चाहते नही

बस इसी तरह चलते चलते
गुजर गए जिन्दगी कि राह से
और फिर तुम अपनी राह चल दी
और मै अपने रास्ते चल दिया II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

 
 
  

HISSAB (ACCOUNT)

हिसाब

लोगो ने मेरा इस्तेमाल किया
इसका दुःख है मुझे
पर तुम देखती रही
इसने मुझे शर्मसार कर दिया

या तो तुम मुझे समझ नही सकी
या मै तुम्हे समझा नही सका
या तुम मुझे अपना नही सकी
या मै तुम्हे अपना बना नही सका

या तो तुम स्वार्थी थी
या मै कमअक्ल था
शायद मै ही कम अक्ल था
क्योंकि आखिर इस्तेमाल तो मै ही हुआ

आखिर मेरा ही हुआ शोषण
आखिर मै ही लुटा
तुम्हारा या किसी और का क्या गया
जो गया मेरा ही गया

मगर अभी खतम कहाँ हुआ है यह तमाशा
अभी तो जिन्दगी बाकि है
फिर मिलेंगे किसी जन्म मै तो करेंगे हिसाब
क्या तुमने पाया और क्या हमारा गया II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Thursday, July 15, 2010

MARYADA SEEMA KI (LIMITATIONS)

मर्यादा सीमा कि  

मत डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

टूट जाती है जब सीमाए वो
तब नहीं रहता डर उसे  किसी बात
उढ़ जाता है वो बनके बादल
बिखर जाता है वो आकाश सा

है अगर डर तो इस डर की वजह भी
यह नाती, सम्बन्धी और रिश्तेदार ही है
उठ जाती जब ऊँगली एक बार समाज की
फिर नहीं डरता इन्सान समाज  से
फिर रहती नहीं परवाह उसे किसी बात की है

बदलते हालात के साथ इन्सान भी बदल जाता है
जाता था डर जो बन्दा नाम से मौत के
उसीका पता हर आते जाते
रह्गुजार से जानना चाहता है

रहता है जब सीमा में अपनी
तब तक ही डर से समाज का व्यवहार होता है
लाँघ जाता है जब यह सीमा अपनी
रहता नहीं कोई मतलब इसका
तब तो बस यह नारी का ही शिंगार होता है

इसीलिए कहता हूँ मै कि
मत   डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी


ARTH (MEANING OR ECONOMY)

अर्थ

आज की दुनिया में होता है
समर्थ में एक बड़ा भाग अर्थ का
पूछता है कौन ज्ञान को उसके और 
बिना अर्थ के लगता है वो व्यर्थ सा

भागता है इन्सान पीछे जिस अर्थ के
क्या वो उस अर्थ का अर्थ भी जानता है
है नहीं होता अर्थ सिर्फ स्वार्थ में
बल्कि होता है अर्थ परमार्थ में भी
क्या इस सच को वो आज पहचानता है

इन्सान जीवन में जब कोई कार्य
निस्वार्थ भाव से करता है
तभी सही मायने में पहचानता है खुद को
और अपने जीवन के अर्थ को सकारथ करता है

है जीवन का अर्थ नहीं है अर्थ कमाना
बल्कि जीवन का अर्थ है परमार्थ कमाना
है परमार्थ का अर्थ है उस परम का अर्थ
उस परम का अर्थ है उसके प्राणियों का कल्याण

यही सच्चा अर्थ है उस अर्थ का
यही सत्य है यही शिव है यही सुंदर है
यही है वो अर्थ जो वासुदेव कुटम्बकम 
की भावना को चिर्तार्थ करता है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी  

MANAV ADHIKAR (HUMAN RIGHTS)

मानव अधिकार

मानव अधिकार की हम
बढ़ी बढ़ी बाते तो खूब करते है
पर खुद को हम क्या
सच्चा मानव कह सकते है

मानव कर्तव्यो की कहीं
देती न बात सुनाई है
हर तरफ बस
मानव अधिकारों की मची दुहाई है

बिना कर्तव्यो के अधिकार की बात तो
जानवर ही कर सकते है
मानव तो अधिकार से पहले
कर्तव्य अपना पूरा करते है

उठाकर बंदूक, चलाकर
 निर्दोष निहत्थो पर गोली
क्या तुम मानवता का कार्य करते हो
अरे ! हमे तो तुम, जानवर से भी बदतर लगते हो

है मानव अधिकार का सच्चा अधिकारी वो मजदूर
जो दिन भर तेज धूप में काम करता है
तब जाकर कहीं वो
अपने परिवार का आधा पेट भरता है

है मानव अधिकार की सच्ची प्रार्थी वो महिला
जो घर से पढ़ने या काम करने को निकलती है
जो बचा बचाकर आंचल अपना
खुद के साये से भी डरती है

है मानव अधिकार की गुहार के लायक वो बच्चे
जो पडे है सडक पर कुपोषण और भूख से बिलखते
कुते को मिलते है बिस्कुट और
 है वो रोटी को भी सिसकते

है मानव अधिकार के काबिल वो युवक
है आत्मा जिनकी देख डिग्री को अपनी
लम्बी सांसे भर्ती है, नहीं मिलती जब नौकरी उनको
तो हररोज उनके अरमानो की चिता जलती है

है मानव अधिकार के जरूरतमन्द वो बूढ़े
जो अकेले पढ़े तन्हाई में रोते है
और बेखबर भावनाओ से उनकी
डाले बाँहों में बाहें अपनी
 उनके बच्चे निश्चिन्त होकर सोते है

मानव अधिकारों की रक्षा के लिए
इधर उधर मत भटक
पहले खुद मानव बन फिर अपने आस पास
सच में  मानव अधिकारों की रक्षा कर

इन मानव रुपी दानवो की हित की बात मत कर
यह नही है इसके काबिल और
देकर सुरक्षा इन हैवानो को
मानव अधिकारों की महत्ता मत कम कर II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

SURAT (CONDITION)

सूरत

कोई भूखा है माया का
कोई भूखा है काया का
और पाना चाहता है नाम कोई
लेकर सहारा राम का

मजहब का कोई ठेकेदार बना
कोई लेकर हथियार निकल चला 
कातिल है जो बेगुनाहों का
हो सकता है क्या वो बंदा खुदा का

त्रिष्नाओ की इस अंधी दौढ़ में
हर कोई शामिल हो चुका है
देकर तिलांजली आदर्शो को
स्वार्थो की अग्नि में झोंक चुका है

हर गली हर चौराहे पर
दुर्योधनो का दरबार सजा है
हररोज इन महफ़िलो में
द्रोपदियो का चीर हरण हो रहा है

महंगाई का बोझ
हर किसी को रुला रहा है
जे पी आन्दोलन की
 याद दिला रहा है

अंग्रेजो ने जब
पाबन्दी नमक पर लगाई थी
तब महात्मा गाँधी ने तब
 दांडी यात्रा करवाई थी

सरकार ने तो
पानी की कीमते है बेतहाशा बढ़ाई
अगली बारी शायद अब
हवा की ही है आई

नशे में उलझा, भौतिक सुखो में उलझा
देश का नौजवान सो रहा है
देख कर दुर्दशा उनकी मजबूर बूढ़ा माँ बाप
जीवन चक्की  में पिसता रो रहा है

हमसे पहले की पीढ़ी ने हमे
महात्मा गाँधी, पटेल, नेहरु और सुभाष
की तस्वीर दिखाई थी
हमने भी तुम्हे
जे पी और विनोबा भावे की कथा सुनाई थी   

पर   झूठी उन्नति की कामना ने
हमारी आँख पर पट्टी चढ़ाई थी
लेकर बोफोर्स, चारा घोटाला, ताबूत घोटाला
हमने उसकी कीमत चुकाई थी

मगर कह सकते है हम की
देकर बलिदान श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भगत सिंह
अपनी समाधि में सोते है

वो बात दीगर है की
कुछ लोग अब भी जाकर
जिन्ना की मजार पर रोते है

अरे ! आज के नौजवानों सोचो
क्या दोगे जवाब तुम अपनी आने वाली पीढ़ी को
जब लुट रहा था देश तब क्या सो रहे थे तुम
सुलगा के नशे की बीढ़ी को

सुन लो तुम भी कुछ गुमराह  नौजवानों
की माना की बदलना हालात आसान नहीं है
पर उठाकर हथियार करना कत्ले आम
यह भी तो कोई समाधान नहीं है

इस तरह तो जनता दोनों तरफ से पिसती है
एक तरफ मारते है नक्सलवादी तो
दूसरी तरफ पुलिस परेशान करती है

महात्मा गाँधी ने भारत के इतहास में
लढ़ी सबसे बढ़ी लढ़ाई  थी मगर क्या कभी
उन्होंने एक भी गोली चलाई थी

माना की फोढ़कर बम्ब
भगत सिंह ने असेम्बली हिलाई थी
मगर क्या किसी निर्दोष ने कभी उनके हाथो
अपनी जान गवाई थी  

कहता नहीं हूँ की
रखके हाथ पर हाथ बैठे रहो
यह भी नहीं कहता की
चुपचाप जुल्म को सहते रहो

करना तो तुम्हे ही होगा
क्योंकि तुम्ही हमारी आशा हो
कैसा होगा इस देश का भविष्य
इसकी तुम परिभाषा हो

होना होगा परिपक्व इतना तुम्हे की
तुम्हे कोई बहका न पाए
उठाकर फ़ायदा किसी कमजोरी का तुम्हारी
कमजोर हमें बना न जाये

बहादुर, समझदार और देश भक्त
हो नौजवान इस देश का
इसकी बहुत जरूरत है
उज्वल हो भविष्य इस देश का
इसकी यही बस एक सूरत है II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   
    
 

Wednesday, July 14, 2010

HUL (SOLUTION)

हल
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में बिखरे है
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
करके याद उन सपनो को
मै खुद ही सहम जाता हूँ

नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी
आशा के गीत गुनगुनाये थे
करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ

नही चाहता की मिले आँखे
मेरी उन आँखों से क्योंकि
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
उन सवालों के जवाब
 मै खुद को नहीं दे पाता हूँ

और इस तरह घबराकर मै
 फेंककर तोढ़ देता हूँ  आइना
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकढ़ो में
 मै अब भी उसी चेहरे को ही मौजूद पाता हूँ

अब आता समझ की नहीं है
 हल भागना किसी समस्या का
समेटकर उन टुकढ़ो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   
 
  

ANT (END)

अंत
स्वार्थ से भरी बात  है
जैसे अँधेरे  में  रस्सी सा लगे सांप
इस रस्सी से जो दूसरो को बांधने जाता है
यह सांप उसी को लिपट जाता है

होता है जहर तीखा इतना इस सांप का
 कि फिर इन्सान को  अच्छे बुरे का
ध्यान ही कहाँ रह जाता है

मै, मेरा, अपना और पराये के
इस जाल में बुरी तरह उलझ जाता है
जलाकर कामनाओ कि आग मन में
यह इन्सान को पथ भ्रष्ट कर जाता है

नही सोचता इन्सान कि
जब देगा महत्व हर कोई स्वार्थ को अपने तो
तो समाज भला कहाँ जायेगा
क्यों देगी माँ दूध बच्चे को
क्यों पिता बच्चे पर लाढ लुटायेगा

इसी लिए तो  कहते है कि
निस्वार्थ पवन सा बहना सीखो
बरसों बनकर मेघ सावन के
औरो कि प्यास भुझाना सीखो

जानते हो कि स्वार्थो का यह फंदा
आखिर तुम्हे कहाँ ले जायेगा
बाद मरने के जब जलायेगे तुझे तेरे अपने
तब समझेगा तू कि पंचभूत का शरीर था यह तो
 होकर नष्ट प्रकृति में ही  मिल जायेगा  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

Wednesday, July 7, 2010

NADAN BALAK (NAUGHTY CHILD)

नादान बालक
चारो तरफ की हवाएं मैली हो चुकी है
पानी की रंगत मटमैली हो चुकी है
हो गई है कढ़वी गंडेरिया
गंगा की धार अब मैली हो चुकी है

हो चुका है इतना  दोहन माँ वसुंधरा का
की माँ की छाती अब खाली हो चुकी है
कर दिया है तार तार आंचल इतना माँ का (OZONE LAYER)
की छनती थी सूर्य की किरने वहां से
वो किरने अब कसैली हो चुकी है

कभी गलाकर खुद को
यह हिम शिलाए देती थी
पानी की संजीवनी इन्सान को
वोही धार अब बनकर बाढ़
कैसी तूफानी हो चुकी है

ऐ ! धरती पुत्रो
माँ का इशारा समझो अब तो
बनकर नादान मत नोचो उसको
समझो कुछ फर्ज अपना भी
कर दो फिर से हरा भरा
माँ  वसुंधरा  के  आँचल को
कही फट गयी गुस्से से माँ
मत कहना फिर यह की नहीं था पता हमको
की माँ इतनी विषैली हो चुकी है II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी 


  

Monday, July 5, 2010

SAKOON (A LITTLE SATISFACTION)

सकून

मै कैसे शामिल होता ख़ुशी मै तुम्हारी
जब की तुम कभी
गम मै भी मेरे शामिल नहीं हुए

देख कर खुश तुम्हे क्यों आये
 आंसू ख़ुशी के आँखों मै हमारी 
जबकि हमारे जीवन के इतने गमो को 
कभी तुम्हारी आंख के आंसू  हासिल न हुए 

जब न जलता था चूल्हा घर मै मेरे 
तुम अपने आंगन में
 घी के दिए जलाते थे

गाते थे तराने हम जब गम के   
तब होठ तुम्हारे 
ख़ुशी के गीत गुनगुनाते थे 

मगर जब बदली फिजायें 
तब क्यों चाहते थे तुम
की खढ़े रहे हम साथ तुम्हारे 

मगर तुम्हारे गम से न खुश हूँ न उदास हूँ 
न दूर हूँ न पास हूँ क्योंकि 
कोई रिश्ता नही समझता मै बीच हमारे 

यह दूरियां बनाई है तुमने 
निभाई है हमने और बन गए है
 अब हम नदी के दो किनारे

अब होंगे आमने सामने हम 
पर मिल नहीं पाएंगे होगा मगर
होगा यह सकून की हो तुम सामने हमारे II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी    
   

Wednesday, June 30, 2010

KHOON KE GHOONT

खून के घूँट

कहते है की जब मालिक ने बनाई दुनिया
उसे भी बहुत परेशानी आयी थी
जब बांटी जिन्दगी उसने तब
उसकी नीति भी इंसान को कहाँ भायी  थी

हुआ जब बंटवारा उम्र का
गधे की बारी सबसे पहले आई थी
पूछा जब मालिक ने उससे तो
वर्ष सौ पर उसने गर्दन हिलाई थी

फिर आयी जब  बारी कुते की
तो उसने भी वर्ष सौ पर दुम हिलाई थी
फिर बुलाया जब उल्लू  को तो
उसने भी सौ पर आँख घुमाई थी

फिर आया इंसान लगा जब पता उसको
की सिर्फ पचीस वर्ष की उम्र ही उसके हिस्से आई थी
भला कैसे करता बर्दाश्त वो इसको
खूब उसने मचाई दुहाई थी

आया तरस भगवान को उसपर और
बुला गधे को उसकी मति घुमाई थी
घटाकर पच्चीस वर्ष उम्र उसकी
इंसान की उम्र बढ़ाई थी

फिर बुला कुते और उल्लु को
वही नीति अपनाई थी
हो गयी उम्र इंसान की वर्ष सौ
बाकी सबकी उम्र घटाई थी

कहते है की है उम्र अपनी वर्ष 25 इंसान की
बाकी उसकी उम्र है उधार की
रहता है वो इंसान पच्चीस तक
बाकी उम्र है बेकार की

पच्चीस से पचास तक है ढोता
वो बोझा सारे परिवार  का
लगता है वो गधा तब और
होता नही है उसमे लक्षण कोई इंसान का

बीच 50 से 75 के हो जाती है कम ताकत उसकी
और होती नही किसी को जरूरत उसके साथ की
लगता है हर को वो भौंकता कुते सा
लगती है हर बात उसकी सबको बकवास सी

पचहतर से सौ तक तो होता गजब है
समझ जाता है वो की
अरे, ये तो दुनिया अजब  है

जिस घर के लिए उसने पूरी उम्र गवाई थी
अब उन्ही घरवालो ने घर के बाहर
खटिया उसकी बिछाई थी

रात को भी वो उल्लू सा जागता रहता  था
रह रहकर देखता था उपर को
और असमान की तरफ ताकता रहता  था

करता है गिला ईश्वर से क्यों आपने
गधे, कुते और उल्लू की मति घुमाई थी
घटाकर उम्र उनकी क्यों इंसान की उम्र बढ़ाई थी

चाहें मै  कम जीता
पर इन्सान की तरह तो जीता
बनता सर्वश्रेष्ठ रचना तुम्हारी
पर इस तरह खून के घूँट तो न पीता II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी

Tuesday, June 29, 2010

SAACH (TRUTH)

सच
बहुत अच्छा बनने का प्रयत्न  कभी कभी
 बुरा पढ़ने का सबब बन जाता है
इंसान किसी को भी खुश नही कर पाता
और हर कोई उससे खफा हो जाता है

अच्छे बुरे की पहचान  ही कहाँ है दुनिया को
उसे तो बस बनाकर दूसरे को तमाशा मज़ा आता है
सच और झूठ के पचढ़े मै नही फंसती दुनिया
उसे तो बस अपना स्वार्थ ही सच नज़र आता है

करता है पूजा वो करवाने को पूरी अपनी मांगे
वर्ना भगवान भी उसे कहाँ याद आता है
तभी तो कहता हूँ दोस्तों
की मत सुनो परिभाषाये दुनिया की
मानो सच उस को
जो तुम्हारी अंतरात्मा को सच समझ आता है

लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी     

Monday, June 28, 2010

मोढ़ (TURNING)

मोढ़

आज फिर कुछ बीते पल याद आ गए
आज फिर वो गुजरे कल हमे रुला गये
आज फिर तुम्हारी यादो की खुश्बो  ने हमे महका दिया
आज फिर तुम्हारे चहेरे के नूर ने हमे बहका दिया

कुछ पल के लिए हम आज को भूल गये
कुछ पल के लिए हम रिश्तो पर लगे दाग को भूल गए
भूल गये कुछ पल के लिए की बेवफा हो तुम
भूल गये कुछ पल के लिए की हो गयी शाम जिस की वो सुबह हो तुम

की थी जब बेवफाई तुमने तब शायद इतना नहीं रोये थे हम
समझोगी हमारी वफ़ा को इन्ही ख्यालो मै खोये थे हम
फिर बीतते समय की धूल ने उन यादो को छुपा दिया
फिर दिल के आइने मै उभरे नए चहेरो ने तुम्हारे अक्स को भी छुपा दिया

न जाने हुआ क्या आज जो तुम याद आ गयी
न जाने आज क्यों जीवन के इस मोढ़ पर तुम हमसे टकरा गयी
भूल गए थे जिन पलो को हम
उन भूली बिसरी यादों को क्यों याद करा गयी

इस मोढ़ पर जब हो गयी हमारे तुम्हारे जीवन की शाम
करके याद अपनी बेवफाई शायद तुम घबरा गयी
देने को सफाई अपनी आखरी पल मै अब आ गयी

मगर दे पायगो क्या वापिस उन फूलो को
जो तुमने पैरो के नीचे कुचल दिए
दोगे दिलासा हमे अब क्या इस अंतिम मोढ़ पर
 क्योंकि  हम कहके अलविदा  अब तो चल दिए II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी  

Thursday, June 24, 2010

KUL - YESTERDAY OR TOMMORROW

कल

होता है कोई जब पास तुम्हारे
तब तुम उसे क्यों नहीं सम्भालते

रोता है जब कोई पास तुम्हारे
क्यों हँसते हो उसपर तुम
क्यों तुम उसे नही पुचकारते

जब मांगता है कोई प्यार तुमसे
क्यों करते हो आहत भावनाए उसकी
क्यों प्यार से उसे पास नहीं बिठालते

गिर जाता है कोई चलते चलते साथ तुम्हारे
क्यों मारते हो एक और ठोकर उसको
पकढ़कर बाहं उसकी क्यों उसे नही उठालते 

दिखाता है कोई जख्म जब तुमको
क्यों छिढ़कते हो नमक उसपर
लगाकर मलहम  उसपर क्यों उसे नहीं सम्भालते

अरे ! मत याद करो बीते कल को
संभालो आज को जो है पास तुम्हारे
नही तो निकाल जायेगा आने वाला कल भी हाथ से
और रह जाओगे बस तुम उसे पुकारते II

लेखक :  प्रवीण चन्द्र झांझी     

MISS

मिस

कभी समझती थी नारी
गौरव अपना बनने मै माँ
अब माँ कहलाने मै वो शर्माती है

कभी लुटाती थी ममता
वो कहकर बेटा बेगानों को भी 
आज अपने बेटे को भी सबके सामने
पहचानते हुए घबराती है

है तन के सोंदर्य का
नाता सिर्फ मन  से
ममता तो नारी की आत्मा होती है

पर है कहाँ आत्मा आज पास नारी के 
चहेरे की सजावट और शरीर की बनावट
आज उसे सबसे प्यारी होती है

हो चाहे आहत मन बेटे का
हो जाये बेशक तार तार दामन ममता का
बस कहलाकर खुद को 'मिस'
 उसकी शान निराली होती है II

लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी   

AAG

आग

महानगर की इस भीढ़ में
कभी सभी चहेरे जाने पहचाने से लगते है
और कभी सबके सब अनजाने से लगते है

कभी जब होता हूँ फुर्सत में
देखता हूँ हर किसी में
अक्स किसी न किसी जानने वाले  का

और जब दौढ़ती है जिन्दगी तो  
नहीं पहचानता मै किसी को 
क्योंकि नही ठहरती नज़र किसी पर 

मानव सिरों की इस भीढ़ मै 
निकलती है तो बस तरंगे 
चिन्ताओ, आकान्शाओ और कामनाओ की

या फिर निकलता है धुआं
अतृप्त इच्छाओं, इर्ष्या और वासनाओ
की अधजली लाशो का

खढ़ा होकर ओवर ब्रिज पर 
देखता हूँ नीचे लोगो को 
भागते हुए रोंन्धकर एक दूसरे को 

तो आती है याद बहुत 
गाँव की उस चोंपाल  की जहाँ
एक ही हुक्के मै सब लगते है कश 

होकर बेखबर की किसका है हुक्का 
किसने भरा था इसमें पानी और 
किसने डाली थी आग अपने प्यार की II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी    
  


Saturday, June 19, 2010

DURR (FEAR)

डर
ठिठक कर क्यों ठहर गयी हो
क्या सोच कर सहम गयी हो
गर्मी की इस तपती दोपहर में
क्या देखकर सिहर गयी हो

कभी एक स्पर्श से फैलती थी सिहरन
अब बाँहों में आकर क्यों बिखर गयी हो
भावनाओ का है बुद्धि से  नाता गहरा
वर्ना तुम थी जो तुम तो वही हो

वफ़ा तुम्हारी फितरत न थी
बेवफाई हमारी आदत न थी
न तुम बदले न हम बदले
हम भी वही है तुम भी वही हो

कुदरत ने बदली फिजाये
वक़्त ने बदली दिशाए
जब नहीं डरते अपने अंजाम से हम
तो हमारे अंजाम से तुम क्यों डरी हुई हो

मत घबराओ तुम और हमसे
न घबराए हम और तुमसे
ये जीवन तो है भोग कर्मो का
फिर बाद उसके हम कहीं है तुम कहीं हो  II

लेखक   प्रवीण चन्द्र झांझी
   

Friday, June 18, 2010

BAADH (AFTER)

बाद

ऐश्वर्य का चिन्ह भोग नहीं है
न विलासता ही उसकी पहचान है
ऐश्वर्य तो है दर्पण विचारो का
उसका उजलापन ही उसकी पहचान है

रिश्तो की घनिष्टता की पहचान सम्बन्ध नहीं है 
न रिश्ते किसी दिखावे के मोहताज है 
रिश्ते तो परिणिति है भावनाओ की 
बुरे वक़्त में उभरती है भावनाए जिसकी 
वो ही तो सच्चा इंसान है 

मानव जीवन का मतलब स्वार्थ नही है 
स्वार्थ से तो पशु भी है जीते 
रहकर निस्वार्थ, करके परमार्थ ही 
महापुरष बन जाते विरले लोग 

है वो बात दीगर की 
नहीं मिलती पहचान जीते जी उनको 
पर बाद मरने के उनके 
याद करके बहुत रोते है लोग II

लेखक  प्रवीण चन्द्र झांझी    

BADLAV (CHANGE)

बदलाव

भावनाओ की आंधी के संग
उढ़ चले कुछ रिश्तो के कण
आकर इंसान की आँखों में चिपक गए

न चाहकर भी है झेलना पढ़ता उनको 
क्योंकि नाजुक है बहुत वो अंग 
क्या होगा अगर वो जख्म नासूर में बदल गए 

अक्सर बहकर वासना की लहरों पर इंसान 
 ढूँढता है बाद निकल जाने के तूफ़ान
की उसके सिदान्तो के अवशेष कहाँ  गए 

कमजोर शणो में ही होती है 
परीक्षा इंसान के सयम की 
वर्ना तो कई योगी भोगी बनकर बिखर गए 

हो जाये अगर कभी गल्ती
तो उस गल्ती तो जीवन भर मत ढोना
ऐसा करना की आगे की सुधर जाये 

कई बार है जलता, कई बार है तपता सोना 
ताकि वो जलकर और तपकर वो सोना 
आखिर कुंदन में बदल सके

चलकर इन टेढ़े मेढ़े रास्तो पर जीवन के 
 समझ पाता है मानव की कैसे वो बदले खुद को 
ताकि वो अंत में आखिर अपनी मंजिल पर पहुंच सके II

लेखक  प्रवीण चन्द्र झांझी