Thursday, June 24, 2010

AAG

आग

महानगर की इस भीढ़ में
कभी सभी चहेरे जाने पहचाने से लगते है
और कभी सबके सब अनजाने से लगते है

कभी जब होता हूँ फुर्सत में
देखता हूँ हर किसी में
अक्स किसी न किसी जानने वाले  का

और जब दौढ़ती है जिन्दगी तो  
नहीं पहचानता मै किसी को 
क्योंकि नही ठहरती नज़र किसी पर 

मानव सिरों की इस भीढ़ मै 
निकलती है तो बस तरंगे 
चिन्ताओ, आकान्शाओ और कामनाओ की

या फिर निकलता है धुआं
अतृप्त इच्छाओं, इर्ष्या और वासनाओ
की अधजली लाशो का

खढ़ा होकर ओवर ब्रिज पर 
देखता हूँ नीचे लोगो को 
भागते हुए रोंन्धकर एक दूसरे को 

तो आती है याद बहुत 
गाँव की उस चोंपाल  की जहाँ
एक ही हुक्के मै सब लगते है कश 

होकर बेखबर की किसका है हुक्का 
किसने भरा था इसमें पानी और 
किसने डाली थी आग अपने प्यार की II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी    
  


No comments:

Post a Comment