आग
महानगर की इस भीढ़ में
कभी सभी चहेरे जाने पहचाने से लगते है
और कभी सबके सब अनजाने से लगते है
कभी जब होता हूँ फुर्सत में
देखता हूँ हर किसी में
अक्स किसी न किसी जानने वाले का
और जब दौढ़ती है जिन्दगी तो
नहीं पहचानता मै किसी को
क्योंकि नही ठहरती नज़र किसी पर
मानव सिरों की इस भीढ़ मै
निकलती है तो बस तरंगे
चिन्ताओ, आकान्शाओ और कामनाओ की
या फिर निकलता है धुआं
अतृप्त इच्छाओं, इर्ष्या और वासनाओ
की अधजली लाशो का
खढ़ा होकर ओवर ब्रिज पर
देखता हूँ नीचे लोगो को
भागते हुए रोंन्धकर एक दूसरे को
तो आती है याद बहुत
गाँव की उस चोंपाल की जहाँ
एक ही हुक्के मै सब लगते है कश
होकर बेखबर की किसका है हुक्का
किसने भरा था इसमें पानी और
किसने डाली थी आग अपने प्यार की II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
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