कल
होता है कोई जब पास तुम्हारे
तब तुम उसे क्यों नहीं सम्भालते
रोता है जब कोई पास तुम्हारे
क्यों हँसते हो उसपर तुम
क्यों तुम उसे नही पुचकारते
जब मांगता है कोई प्यार तुमसे
क्यों करते हो आहत भावनाए उसकी
क्यों प्यार से उसे पास नहीं बिठालते
गिर जाता है कोई चलते चलते साथ तुम्हारे
क्यों मारते हो एक और ठोकर उसको
पकढ़कर बाहं उसकी क्यों उसे नही उठालते
दिखाता है कोई जख्म जब तुमको
क्यों छिढ़कते हो नमक उसपर
लगाकर मलहम उसपर क्यों उसे नहीं सम्भालते
अरे ! मत याद करो बीते कल को
संभालो आज को जो है पास तुम्हारे
नही तो निकाल जायेगा आने वाला कल भी हाथ से
और रह जाओगे बस तुम उसे पुकारते II
लेखक : प्रवीण चन्द्र झांझी
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