खून के घूँट
कहते है की जब मालिक ने बनाई दुनिया
उसे भी बहुत परेशानी आयी थी
जब बांटी जिन्दगी उसने तब
उसकी नीति भी इंसान को कहाँ भायी थी
हुआ जब बंटवारा उम्र का
गधे की बारी सबसे पहले आई थी
पूछा जब मालिक ने उससे तो
वर्ष सौ पर उसने गर्दन हिलाई थी
फिर आयी जब बारी कुते की
तो उसने भी वर्ष सौ पर दुम हिलाई थी
फिर बुलाया जब उल्लू को तो
उसने भी सौ पर आँख घुमाई थी
फिर आया इंसान लगा जब पता उसको
की सिर्फ पचीस वर्ष की उम्र ही उसके हिस्से आई थी
भला कैसे करता बर्दाश्त वो इसको
खूब उसने मचाई दुहाई थी
आया तरस भगवान को उसपर और
बुला गधे को उसकी मति घुमाई थी
घटाकर पच्चीस वर्ष उम्र उसकी
इंसान की उम्र बढ़ाई थी
फिर बुला कुते और उल्लु को
वही नीति अपनाई थी
हो गयी उम्र इंसान की वर्ष सौ
बाकी सबकी उम्र घटाई थी
कहते है की है उम्र अपनी वर्ष 25 इंसान की
बाकी उसकी उम्र है उधार की
रहता है वो इंसान पच्चीस तक
बाकी उम्र है बेकार की
पच्चीस से पचास तक है ढोता
वो बोझा सारे परिवार का
लगता है वो गधा तब और
होता नही है उसमे लक्षण कोई इंसान का
बीच 50 से 75 के हो जाती है कम ताकत उसकी
और होती नही किसी को जरूरत उसके साथ की
लगता है हर को वो भौंकता कुते सा
लगती है हर बात उसकी सबको बकवास सी
पचहतर से सौ तक तो होता गजब है
समझ जाता है वो की
अरे, ये तो दुनिया अजब है
जिस घर के लिए उसने पूरी उम्र गवाई थी
अब उन्ही घरवालो ने घर के बाहर
खटिया उसकी बिछाई थी
रात को भी वो उल्लू सा जागता रहता था
रह रहकर देखता था उपर को
और असमान की तरफ ताकता रहता था
करता है गिला ईश्वर से क्यों आपने
गधे, कुते और उल्लू की मति घुमाई थी
घटाकर उम्र उनकी क्यों इंसान की उम्र बढ़ाई थी
चाहें मै कम जीता
पर इन्सान की तरह तो जीता
बनता सर्वश्रेष्ठ रचना तुम्हारी
पर इस तरह खून के घूँट तो न पीता II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
Wednesday, June 30, 2010
Tuesday, June 29, 2010
SAACH (TRUTH)
सच
बहुत अच्छा बनने का प्रयत्न कभी कभी
बुरा पढ़ने का सबब बन जाता है
इंसान किसी को भी खुश नही कर पाता
और हर कोई उससे खफा हो जाता है
अच्छे बुरे की पहचान ही कहाँ है दुनिया को
उसे तो बस बनाकर दूसरे को तमाशा मज़ा आता है
सच और झूठ के पचढ़े मै नही फंसती दुनिया
उसे तो बस अपना स्वार्थ ही सच नज़र आता है
करता है पूजा वो करवाने को पूरी अपनी मांगे
वर्ना भगवान भी उसे कहाँ याद आता है
तभी तो कहता हूँ दोस्तों
की मत सुनो परिभाषाये दुनिया की
मानो सच उस को
जो तुम्हारी अंतरात्मा को सच समझ आता है
लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी
बहुत अच्छा बनने का प्रयत्न कभी कभी
बुरा पढ़ने का सबब बन जाता है
इंसान किसी को भी खुश नही कर पाता
और हर कोई उससे खफा हो जाता है
अच्छे बुरे की पहचान ही कहाँ है दुनिया को
उसे तो बस बनाकर दूसरे को तमाशा मज़ा आता है
सच और झूठ के पचढ़े मै नही फंसती दुनिया
उसे तो बस अपना स्वार्थ ही सच नज़र आता है
करता है पूजा वो करवाने को पूरी अपनी मांगे
वर्ना भगवान भी उसे कहाँ याद आता है
तभी तो कहता हूँ दोस्तों
की मत सुनो परिभाषाये दुनिया की
मानो सच उस को
जो तुम्हारी अंतरात्मा को सच समझ आता है
लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी
Monday, June 28, 2010
मोढ़ (TURNING)
मोढ़
आज फिर कुछ बीते पल याद आ गए
आज फिर वो गुजरे कल हमे रुला गये
आज फिर तुम्हारी यादो की खुश्बो ने हमे महका दिया
आज फिर तुम्हारे चहेरे के नूर ने हमे बहका दिया
कुछ पल के लिए हम आज को भूल गये
कुछ पल के लिए हम रिश्तो पर लगे दाग को भूल गए
भूल गये कुछ पल के लिए की बेवफा हो तुम
भूल गये कुछ पल के लिए की हो गयी शाम जिस की वो सुबह हो तुम
की थी जब बेवफाई तुमने तब शायद इतना नहीं रोये थे हम
समझोगी हमारी वफ़ा को इन्ही ख्यालो मै खोये थे हम
फिर बीतते समय की धूल ने उन यादो को छुपा दिया
फिर दिल के आइने मै उभरे नए चहेरो ने तुम्हारे अक्स को भी छुपा दिया
न जाने हुआ क्या आज जो तुम याद आ गयी
न जाने आज क्यों जीवन के इस मोढ़ पर तुम हमसे टकरा गयी
भूल गए थे जिन पलो को हम
उन भूली बिसरी यादों को क्यों याद करा गयी
इस मोढ़ पर जब हो गयी हमारे तुम्हारे जीवन की शाम
करके याद अपनी बेवफाई शायद तुम घबरा गयी
देने को सफाई अपनी आखरी पल मै अब आ गयी
मगर दे पायगो क्या वापिस उन फूलो को
जो तुमने पैरो के नीचे कुचल दिए
दोगे दिलासा हमे अब क्या इस अंतिम मोढ़ पर
क्योंकि हम कहके अलविदा अब तो चल दिए II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
आज फिर कुछ बीते पल याद आ गए
आज फिर वो गुजरे कल हमे रुला गये
आज फिर तुम्हारी यादो की खुश्बो ने हमे महका दिया
आज फिर तुम्हारे चहेरे के नूर ने हमे बहका दिया
कुछ पल के लिए हम आज को भूल गये
कुछ पल के लिए हम रिश्तो पर लगे दाग को भूल गए
भूल गये कुछ पल के लिए की बेवफा हो तुम
भूल गये कुछ पल के लिए की हो गयी शाम जिस की वो सुबह हो तुम
की थी जब बेवफाई तुमने तब शायद इतना नहीं रोये थे हम
समझोगी हमारी वफ़ा को इन्ही ख्यालो मै खोये थे हम
फिर बीतते समय की धूल ने उन यादो को छुपा दिया
फिर दिल के आइने मै उभरे नए चहेरो ने तुम्हारे अक्स को भी छुपा दिया
न जाने हुआ क्या आज जो तुम याद आ गयी
न जाने आज क्यों जीवन के इस मोढ़ पर तुम हमसे टकरा गयी
भूल गए थे जिन पलो को हम
उन भूली बिसरी यादों को क्यों याद करा गयी
इस मोढ़ पर जब हो गयी हमारे तुम्हारे जीवन की शाम
करके याद अपनी बेवफाई शायद तुम घबरा गयी
देने को सफाई अपनी आखरी पल मै अब आ गयी
मगर दे पायगो क्या वापिस उन फूलो को
जो तुमने पैरो के नीचे कुचल दिए
दोगे दिलासा हमे अब क्या इस अंतिम मोढ़ पर
क्योंकि हम कहके अलविदा अब तो चल दिए II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
Thursday, June 24, 2010
KUL - YESTERDAY OR TOMMORROW
कल
होता है कोई जब पास तुम्हारे
तब तुम उसे क्यों नहीं सम्भालते
रोता है जब कोई पास तुम्हारे
क्यों हँसते हो उसपर तुम
क्यों तुम उसे नही पुचकारते
जब मांगता है कोई प्यार तुमसे
क्यों करते हो आहत भावनाए उसकी
क्यों प्यार से उसे पास नहीं बिठालते
गिर जाता है कोई चलते चलते साथ तुम्हारे
क्यों मारते हो एक और ठोकर उसको
पकढ़कर बाहं उसकी क्यों उसे नही उठालते
दिखाता है कोई जख्म जब तुमको
क्यों छिढ़कते हो नमक उसपर
लगाकर मलहम उसपर क्यों उसे नहीं सम्भालते
अरे ! मत याद करो बीते कल को
संभालो आज को जो है पास तुम्हारे
नही तो निकाल जायेगा आने वाला कल भी हाथ से
और रह जाओगे बस तुम उसे पुकारते II
लेखक : प्रवीण चन्द्र झांझी
MISS
मिस
कभी समझती थी नारी
गौरव अपना बनने मै माँ
अब माँ कहलाने मै वो शर्माती है
कभी लुटाती थी ममता
वो कहकर बेटा बेगानों को भी
आज अपने बेटे को भी सबके सामने
पहचानते हुए घबराती है
है तन के सोंदर्य का
नाता सिर्फ मन से
ममता तो नारी की आत्मा होती है
पर है कहाँ आत्मा आज पास नारी के
चहेरे की सजावट और शरीर की बनावट
आज उसे सबसे प्यारी होती है
हो चाहे आहत मन बेटे का
हो जाये बेशक तार तार दामन ममता का
बस कहलाकर खुद को 'मिस'
उसकी शान निराली होती है II
लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी
AAG
आग
महानगर की इस भीढ़ में
कभी सभी चहेरे जाने पहचाने से लगते है
और कभी सबके सब अनजाने से लगते है
कभी जब होता हूँ फुर्सत में
देखता हूँ हर किसी में
अक्स किसी न किसी जानने वाले का
और जब दौढ़ती है जिन्दगी तो
नहीं पहचानता मै किसी को
क्योंकि नही ठहरती नज़र किसी पर
मानव सिरों की इस भीढ़ मै
निकलती है तो बस तरंगे
चिन्ताओ, आकान्शाओ और कामनाओ की
या फिर निकलता है धुआं
अतृप्त इच्छाओं, इर्ष्या और वासनाओ
की अधजली लाशो का
खढ़ा होकर ओवर ब्रिज पर
देखता हूँ नीचे लोगो को
भागते हुए रोंन्धकर एक दूसरे को
तो आती है याद बहुत
गाँव की उस चोंपाल की जहाँ
एक ही हुक्के मै सब लगते है कश
होकर बेखबर की किसका है हुक्का
किसने भरा था इसमें पानी और
किसने डाली थी आग अपने प्यार की II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
Saturday, June 19, 2010
DURR (FEAR)
डर
ठिठक कर क्यों ठहर गयी हो
क्या सोच कर सहम गयी हो
गर्मी की इस तपती दोपहर में
क्या देखकर सिहर गयी हो
कभी एक स्पर्श से फैलती थी सिहरन
अब बाँहों में आकर क्यों बिखर गयी हो
भावनाओ का है बुद्धि से नाता गहरा
वर्ना तुम थी जो तुम तो वही हो
वफ़ा तुम्हारी फितरत न थी
बेवफाई हमारी आदत न थी
न तुम बदले न हम बदले
हम भी वही है तुम भी वही हो
कुदरत ने बदली फिजाये
वक़्त ने बदली दिशाए
जब नहीं डरते अपने अंजाम से हम
तो हमारे अंजाम से तुम क्यों डरी हुई हो
मत घबराओ तुम और हमसे
न घबराए हम और तुमसे
ये जीवन तो है भोग कर्मो का
फिर बाद उसके हम कहीं है तुम कहीं हो II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
Friday, June 18, 2010
BAADH (AFTER)
बाद
ऐश्वर्य का चिन्ह भोग नहीं है
न विलासता ही उसकी पहचान है
ऐश्वर्य तो है दर्पण विचारो का
उसका उजलापन ही उसकी पहचान है
रिश्तो की घनिष्टता की पहचान सम्बन्ध नहीं है
न रिश्ते किसी दिखावे के मोहताज है
रिश्ते तो परिणिति है भावनाओ की
बुरे वक़्त में उभरती है भावनाए जिसकी
वो ही तो सच्चा इंसान है
मानव जीवन का मतलब स्वार्थ नही है
स्वार्थ से तो पशु भी है जीते
रहकर निस्वार्थ, करके परमार्थ ही
महापुरष बन जाते विरले लोग
है वो बात दीगर की
नहीं मिलती पहचान जीते जी उनको
पर बाद मरने के उनके
याद करके बहुत रोते है लोग II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
BADLAV (CHANGE)
बदलाव
भावनाओ की आंधी के संग
उढ़ चले कुछ रिश्तो के कण
आकर इंसान की आँखों में चिपक गए
न चाहकर भी है झेलना पढ़ता उनको
क्योंकि नाजुक है बहुत वो अंग
क्या होगा अगर वो जख्म नासूर में बदल गए
अक्सर बहकर वासना की लहरों पर इंसान
ढूँढता है बाद निकल जाने के तूफ़ान
की उसके सिदान्तो के अवशेष कहाँ गए
कमजोर शणो में ही होती है
परीक्षा इंसान के सयम की
वर्ना तो कई योगी भोगी बनकर बिखर गए
हो जाये अगर कभी गल्ती
तो उस गल्ती तो जीवन भर मत ढोना
ऐसा करना की आगे की सुधर जाये
कई बार है जलता, कई बार है तपता सोना
ताकि वो जलकर और तपकर वो सोना
आखिर कुंदन में बदल सके
चलकर इन टेढ़े मेढ़े रास्तो पर जीवन के
समझ पाता है मानव की कैसे वो बदले खुद को
ताकि वो अंत में आखिर अपनी मंजिल पर पहुंच सके II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
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