सच
बहुत अच्छा बनने का प्रयत्न कभी कभी
बुरा पढ़ने का सबब बन जाता है
इंसान किसी को भी खुश नही कर पाता
और हर कोई उससे खफा हो जाता है
अच्छे बुरे की पहचान ही कहाँ है दुनिया को
उसे तो बस बनाकर दूसरे को तमाशा मज़ा आता है
सच और झूठ के पचढ़े मै नही फंसती दुनिया
उसे तो बस अपना स्वार्थ ही सच नज़र आता है
करता है पूजा वो करवाने को पूरी अपनी मांगे
वर्ना भगवान भी उसे कहाँ याद आता है
तभी तो कहता हूँ दोस्तों
की मत सुनो परिभाषाये दुनिया की
मानो सच उस को
जो तुम्हारी अंतरात्मा को सच समझ आता है
लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी
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