बाद
ऐश्वर्य का चिन्ह भोग नहीं है
न विलासता ही उसकी पहचान है
ऐश्वर्य तो है दर्पण विचारो का
उसका उजलापन ही उसकी पहचान है
रिश्तो की घनिष्टता की पहचान सम्बन्ध नहीं है
न रिश्ते किसी दिखावे के मोहताज है
रिश्ते तो परिणिति है भावनाओ की
बुरे वक़्त में उभरती है भावनाए जिसकी
वो ही तो सच्चा इंसान है
मानव जीवन का मतलब स्वार्थ नही है
स्वार्थ से तो पशु भी है जीते
रहकर निस्वार्थ, करके परमार्थ ही
महापुरष बन जाते विरले लोग
है वो बात दीगर की
नहीं मिलती पहचान जीते जी उनको
पर बाद मरने के उनके
याद करके बहुत रोते है लोग II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment