मिस
कभी समझती थी नारी
गौरव अपना बनने मै माँ
अब माँ कहलाने मै वो शर्माती है
कभी लुटाती थी ममता
वो कहकर बेटा बेगानों को भी
आज अपने बेटे को भी सबके सामने
पहचानते हुए घबराती है
है तन के सोंदर्य का
नाता सिर्फ मन से
ममता तो नारी की आत्मा होती है
पर है कहाँ आत्मा आज पास नारी के
चहेरे की सजावट और शरीर की बनावट
आज उसे सबसे प्यारी होती है
हो चाहे आहत मन बेटे का
हो जाये बेशक तार तार दामन ममता का
बस कहलाकर खुद को 'मिस'
उसकी शान निराली होती है II
लेखक: प्रवीण चन्द्र झांझी
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