Tuesday, August 10, 2010

MRIGTRISHNA

मृगतृष्णा
परदेश मै रहकर देश की मिटटी सुनहरी लगती है
रेगिस्तान मै कंटीली झाड़ी न्यारी लगती है
शहर मै आकर गाँव की गलियां प्यारी लगती है
गाँव मै रहकर शहर की लडकिया सुक्मारी लगती है
बूढ़े पेढ़ को अपनी जड़े प्यारी लगती है

होती है कमी जब तक किसी चीज की
वो तब तक ही प्यारी लगती है
मिल जाती है जब वोही चीज तो
अपनी चाहत बेमानी लगती है
भागते भागते इस मृगतृष्णा के पीछे
इंसान को अपनी जिन्दगी गवानी पडती है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Sunday, August 8, 2010

JEEVAN (LIFE)

जीवन
हुआ पैदा मै जब तो कहा मेरे पिता ने
बड़ी देर लगा दी यार
बहुत कराया तुने इंतज़ार
आया  तू चार लडकियों के बाद
कुछ मजा नही आया

गया स्कूल मै जब मिला टीचर से
नही दी कोई donation और
टेस्ट में मै  होगया पास
कहा टीचर ने  दाखिला तो मिल गया यार
पर मजा नहीं आया

गया कॉलेज में मिला लडकियों से
कहा उन्होंने देखने में हो ठीक ठाक
पर हो  किसी रईस की नही औलाद
मगर चलो बैठो हमारे पास
पर मजा नही आया

गया जब करने नौकरी
तो कहा बास ने कुछ कर के दिखाओ
मेहनत  तो खूब की पर उपर से कुछ नही किया
हो गया बास नाराज और
कहने लगा ये बात
की मजा नही आया

हुई शादी उसके बाद आई बीवी घर में
लाई दो बड़ी बहनों की नसीहत अपने साथ
चाहती थी वो तीनो की सुनु मै  उनकी बात
नही दिया अपने घर का रिमोट जब उनके हाथ
तो बोली तीनो एक साथ की
मजा नही आया

जब तक थे जिन्दा माँ बाप
रखना था उनको हमारे साथ
सब बहने सुनती रही हमारी बात
जाते ही उनके मचा दी बन्दर बाँट
जब बाद कर्तव्य के मैंने मांगे अपने अधिकार
तो लगी कहने सब एक ही बात
की मजा नही आया

हुआ बेटा घर में मेरे बहुत दिया लाढ प्यार
जब तक था पैसा मेरे पास
करता रहा उसकी पूरी हर मांग
तब तक था वो मेरे साथ
फिर जब बदले हालात और हो गया मै बेकार
फिर बन गया मै भार और वो होगया माँ के साथ
और बोला की मजा नही आया

अब कर रहा हूँ मै टाइम पास
कर रहा हूँ इन्तजार की कब जाऊंगा मै
इस दुनिया से पार अपने भगवान के पास
करूँगा शुक्रिया उनका की
चाहे हुआ मै परेशान पर  बतादी आपने
मुझे   इन सांसारिक रिश्तो की औकात
 बस बास मजा आ गया II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

Saturday, August 7, 2010

SOCH APNI (YOUR OWN THINKING)

सोच अपनी

जो नहीं है वो
बनने की कोशिश मत कर
क्या कहेगा जमाना
इस बात की फ़िक्र मत कर

कर ले तू चाहे कुछ भी,
जमाने में साबित तू खुद को बड़ा नही कर पायेगा
पाते ही मौका पहला
जमाना तुझको तेरी औकात बता जायेगा

किसकी नजर में तू होना चाहता है बड़ा
ये जमाना तो खुद दिल से बहुत छोटा है
ये क्या नापेगा ऊंचाई तेरी
ये तो खुद ही नजर का खोटा है

 जीना चाहता है यहाँ अगर तू
इस समाज के उलाहनो की परवाह तू मत कर
इससे पहले की कोई उठाये कोई ऊँगली तुझ पर
कर दे तू शर्मिंदा इनको, असलियत इनकी बताकर

हूँ मै परेशान इस बात से की
खुद है सने जो कीचड़ में
वो हमारे कपड़ो से धूल उड़ाते है
बड़ी बेशर्मी से बदल कर कपडे अपने
फिर समाज के ठेकेदार बन जाते है

बदलकर सोच अपनी
कही तू साथ जमाने के बह मत जाना
बदल दे तू धारा इसकी
ताकि करे  सलाम तुझे ये जमाना II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

 

Monday, August 2, 2010

RASHTAR MANDAL KHEL (COMMON WEALTH GAMES)

राष्ट्र मंडल खेल


कह गए ऋषि मुनि हमारे
जीवन है खेल तमाशा
ऐसे है नेता हमारे कर दिया संधि विच्छेद उसका
और बना दिया खेल को एक तमाशा


स्वर्ण पदक तो मिलेगे खिलाडियों को
बाद करने के मशकत खेल के मैदान में
मगर इन्होने तो मैदान बनने से पहले ही
सोने की खान को लूट लिया


मगर है तारीफ़ इनकी की
इन्होने पांड्वो के सिदान्त को भी मान लिया
जिस की जितनी औकात थी उसको
उतना सोना बाँट दिया


किसी ने स्टेडियम में खाया
किसी ने मकान में खाया
और कोई सड़के बनाकर खा रहा है
किसी को कुछ नही मिला तो वो
बिना मजदूर के नालिया साफ़ करा रहा है


है त्रस्त जनता इस बढती हुई महंगाई से
है परेशान खिलाडी नेताओ के
 निकम्मे खिलाडी जवाई से


मगर है कहते खेल मंत्री की वो चुप रहेंगे
बचायेंगे देश को रुस्बाई से और
खेलो के अंत तक सब यूँही सहेंगे


बाद खेलो के वो अपना मुंह खोलेंगे
बैठाकर आयोग वो सचाई को तोलेंगे


वो आयोग एक के बाद एक तारीख देता जायेगा
और बोफोर्स, ताबूत और चारा घोटाले की तरह
ये भी इतिहास की परतों में दफन हो जायेगा II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

DORAHA (TURNING)

दोराहा
तुम जियो क्योंकि तुम में जीने कि चाह है
तुम चलो अपनी राह पर क्योंकि
 तुम्हारे पास चलने को राह है
छोढ़ दो मुझे मेरे हाल पर क्योंकि
बहुत थक गया हूँ मै

वो वक़्त भी था कभी कि
चलते थे हम चार कदम आगे तुमसे
दोड़ते थे हम तेजी से इतनी कि
रह जाती थी पीछे तुम लड़खड़ाकर 

बढ़ा देते थे रुककर हम हाथ मदद का
कभी सोचा नही था हमने कि
कर देती हो दूर मंजिल हमारी
अपनी धीमी चाल से  

आज जब वक़्त के काँटों ने चुभकर
है कर दिया लहू लुहान पैरो को हमारे
और निकल गयी चंद कदम आगे हमसे
तो देखती हो मुडकर हमको
अपनी इस व्यंग भरी मुस्कान से

शायद तुमने कभी हमे समझने कि कोशिश नही कि
शायद जो बढाया हाथ हमने मदद का
उसे तुम अपना अपमान समझ बैठी
हमने तो कभी अपना बढ़पन दिखाया नही
पर तुम जाने कब खुद को छोटा समझ बैठी

अगर जिन्दगी के इस दोराहे परछोडकर अकेला
 हमे तुम अपनी राहे करना चाहती हो अलग
 तो बेशक कर लो शायद
उससे ही दूर हो जाये छोटेपन का एहसास तुम्हारा

देना कोई सफाई हमारी फितरत नहीं
समझो हमारी भावनाओ को
समझी इस बात कि कभी तुमने जरूरत नहीं
जब  नहीं समझी तब   तो  अब  हमे  क्या  समझ पायोगी
पढता है फर्क क्या अगर छोडकर हमे अकेला तुम आगे चली जाओगी

पड़ गयी है आदत हमे तो
रहकर साथ तुम्हारे फिर भी अकेला रहने की
मगर जब जब बदलेगा मौसम
तब खुद को बहुत अकेला तुम पाओगी

घबरा जाती हो तुम तो जरा सी तन्हाई से
क्या करोगी तुम जब आयेगे दोराहे फिर
क्या  इतनी ही गहराई से
फैसले तुम अकेले ले पाओगी

शायद कभी तुम समझ पाओ कि
महत्व इस बात का नहीं है कि
राह में कौन आगे चलता है
और कौन पीछे चलता है

आवयश्क यह है कि राह में हो एक हमसफर
बनने को हमसफर सिर्फ एक राह पर चलना ही काफी नही
जरूरी है कि हो हमसफर में
भावना विश्वास और समर्पण की

न जाने तुम यह बात
कभी समझ भी पाओगी या नही पाओगी
या फिर करके राह अपनी अलग
हमें यो ही नितांत अकेला छोड़ जाओगी II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

 

Sunday, August 1, 2010

ADHURE LOG (INCOMPLETE PEOPLE)

अधूरे लोग 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 
सब के होते हुए भी पास 
वो दिल से सदा सूने रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 

जब चाहते है वो किसी को 
तो चाहते है इतनी चाहत से
की सामने वाला भी उस चाहत से घबरा जाता है 
वो नहीं पता समझ की 
है वो काबिल उस चाहत के या नहीं 
इसी उलझन में वो खुद को दोराहे पर पाता है
 चाहतो के सफर में वो 
अपने सपनो से जुडे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 

वो रहते है अधूरे क्योंकि 
उन्हें समय पर कुछ नही मिलता 
उन्हें मिलता है जब उनमे 
उसे पाने की चाह नही रहती 
रोते है अरमान उनके 
पर जुबान बेवफा कुछ नही कहती 
उनके साथ यह सब  होता है क्योंकि वो
अपने से परायो से घिरे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है

जब नहीं दिया तुमने हमें अपना अधूरापन
तब हम तुमे अपना अधूरापन कैसे भरने देते
तुमने तो अपना अधूरापन बाँट दिया कइयो में
पर तुम कभी हमारे दिल के दरवाजे से हटी ही नही 
तो किसी को हम अपने दिल में प्रवेश कैसे करने कैसे देते 

शायद तुम तो जीना चाहती थी सिर्फ खुद के लिए
मगर हम तो सिर्फ तुम्हारे साथ थे जीना चाहते 
इस बात को शायद जानती थी तुम
इसीलिए चाहती थी की भर दूँ मै सूनापन तुम्हारा
क्योंकि समझती थी तुम
 कि  चाहे हो जाए तन्हा कितने भी हम
 पर तुमसे शिकवे का कभी कोई शब्द भी न कहते 

मगर ये तो हद है हमारी दीवानगी की 
 या तो हम रहते  है तुम्हारे साथ 
या फिर अपनी चाहतो के साथ रहते  है 
हम अकेले ही संजीदगी से 
अपने सपनो से जुड़े तन्हा बैठे रहते  है 
करते है बाते सिर्फ तुम्हारे साथ 
और नादान दिल को ये समझाते है  

कि है आश्चर्य कितना होते है दीवाने ऐसे भी  
जो रहकर भी अकेले  मस्त इतने रहते है 
कि अपनी मुहब्ब्त कि अपूर्णता में भी इतने पूरे रहते है 
नही करते अपने महबूब से वो शिकवा बेवफाई का 
उस बेवफा की पूर्णता में ही अपने अधूरेपन को भी भूले रहते है
शायद इसीलिए कुछ लोग अधूरे रहकर भी खुद में पूरे रहते है
और नादान जमाने की  नजर मै वो लोग हमेशा अधूरे रहते है II 
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी