Monday, August 2, 2010

DORAHA (TURNING)

दोराहा
तुम जियो क्योंकि तुम में जीने कि चाह है
तुम चलो अपनी राह पर क्योंकि
 तुम्हारे पास चलने को राह है
छोढ़ दो मुझे मेरे हाल पर क्योंकि
बहुत थक गया हूँ मै

वो वक़्त भी था कभी कि
चलते थे हम चार कदम आगे तुमसे
दोड़ते थे हम तेजी से इतनी कि
रह जाती थी पीछे तुम लड़खड़ाकर 

बढ़ा देते थे रुककर हम हाथ मदद का
कभी सोचा नही था हमने कि
कर देती हो दूर मंजिल हमारी
अपनी धीमी चाल से  

आज जब वक़्त के काँटों ने चुभकर
है कर दिया लहू लुहान पैरो को हमारे
और निकल गयी चंद कदम आगे हमसे
तो देखती हो मुडकर हमको
अपनी इस व्यंग भरी मुस्कान से

शायद तुमने कभी हमे समझने कि कोशिश नही कि
शायद जो बढाया हाथ हमने मदद का
उसे तुम अपना अपमान समझ बैठी
हमने तो कभी अपना बढ़पन दिखाया नही
पर तुम जाने कब खुद को छोटा समझ बैठी

अगर जिन्दगी के इस दोराहे परछोडकर अकेला
 हमे तुम अपनी राहे करना चाहती हो अलग
 तो बेशक कर लो शायद
उससे ही दूर हो जाये छोटेपन का एहसास तुम्हारा

देना कोई सफाई हमारी फितरत नहीं
समझो हमारी भावनाओ को
समझी इस बात कि कभी तुमने जरूरत नहीं
जब  नहीं समझी तब   तो  अब  हमे  क्या  समझ पायोगी
पढता है फर्क क्या अगर छोडकर हमे अकेला तुम आगे चली जाओगी

पड़ गयी है आदत हमे तो
रहकर साथ तुम्हारे फिर भी अकेला रहने की
मगर जब जब बदलेगा मौसम
तब खुद को बहुत अकेला तुम पाओगी

घबरा जाती हो तुम तो जरा सी तन्हाई से
क्या करोगी तुम जब आयेगे दोराहे फिर
क्या  इतनी ही गहराई से
फैसले तुम अकेले ले पाओगी

शायद कभी तुम समझ पाओ कि
महत्व इस बात का नहीं है कि
राह में कौन आगे चलता है
और कौन पीछे चलता है

आवयश्क यह है कि राह में हो एक हमसफर
बनने को हमसफर सिर्फ एक राह पर चलना ही काफी नही
जरूरी है कि हो हमसफर में
भावना विश्वास और समर्पण की

न जाने तुम यह बात
कभी समझ भी पाओगी या नही पाओगी
या फिर करके राह अपनी अलग
हमें यो ही नितांत अकेला छोड़ जाओगी II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

 

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