Wednesday, July 28, 2010

PRGATI (PROGRESS)

प्रगति

क्या वास्तव में की है प्रगति मानव ने
क्यों ऐसी प्रगति की मानव ने
क्यां ऐसी प्रगति की ही जरूरत थी

होती है प्रगति शांति के लिए
होती है प्रगति ख़ुशी के लिए
होती है प्रगति ज्ञान के लिए

यह कैसी प्रगति है मानव की
हर कोई है परेशान
हर कोई है अशांत

यह कैसी चली है आंधी कामनाओ की
घूम रहा है हर कोई पागल सा
उठाए गठरी अपनी अधूरी कामनाओ की

अपनी आकान्शाओ की  
बनाली है रबढ़ मानव ने
जितनी खींचो उतनी खिचती चली जाती है

क्यों नहीं समझ पाते लोग
की इतना पाने के बाद भी
जब नहीं मिली शांति मन को तो
पाकर थोडा और वो शांति कैसे पा जायेगा

शांति पाने से नही शांति संतुष्टि से आती है
और संतुष्टि पाने से नही संतुष्टि शांति से आती है
संतुष्टि - शांति है पूरक एक दूजे की
और दोनों ज्ञान से आती है

होता है क्या ज्ञान और
अज्ञान ही ज्ञान का होता है जनक
क्योंकि अज्ञान दूर करने की चाह ही
ले जाती है  हमें पास पास ज्ञान के

किसी वस्तु का न समझ पाना ही
कर जाता है अशांत मनको
यह अशांति और असमर्थता देती है
जन्म ज्ञान प्राप्त करने की चाह को 

मन में रखकर यह चाह ज्ञान की
गुजरा है मानव जिन रास्तो से
उन रास्तो को ही तो विज्ञानं कहते है

क्या सही है वो रास्ते 
गुजर रहा है मानव जिनसे
पाने को ज्ञान अपनी उत्पति का

कही ऐसा तो नहीं की अपनी जननी प्रकृति से
पाने को ज्ञान अपनी उत्पति का
बजाय करने के सहयोग उससे
हम लड़ पड़े है उसी जननी से

वस्तुओ की भोतिकता तो
 हम जान लेगे विज्ञानं से
मगर जानना है कारण उत्पति का
तो हमे ज्ञान को पाना होगा

पहुँच कर ज्ञान तक ही
हम पा पाएंगे ख़ुशी को
असली ख़ुशी है वो
जिसके खोने का डर न हो

होती है ख़ुशी जब शांति हो संतुष्टि हो
यह सब होता है ज्ञान से
और आता है ज्ञान असली प्रगति से

पाने को वास्तविक शांति, संतुष्टि और ख़ुशी
आइये हम  बैठे, सोचे और समझकर
बढ़ाए कदम को असली प्रगति की और II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

   

FARK(DIFFERENCE)

फर्क

ये दर्द अगर बेगाने देते
तो शायद हम सह भी जाते,
मगर क्या करे ये दर्द तो दिए है अपनों ने
जिसे हम किसी से कह भी नही पाते

बाहर वाले तो देकर जख्म
फिर भी छोड़ देते है मगर
अपने आकर उसे कुरेदकर
उसमे नमक भर जाते है

अगर थामी होती  बढ़कर
 अपनों ने वक्त पर बांह हमारी
तो क्या मजाल थी
उस वक्त कि आंधी कि
हमारी खुशिया यू उढ़ा ले जाती

दर्प दम्ब और गर्व से भरे
वो अपने आये और
बताकर कुछ दोष हमारा
और कुछ दोष कर्मो का चले गए

कुछ तो इतने अपने थे कि
उन्होंने आने कि जहमत भी की  नही
वो खड़े रहे दूर और 
देखते रहे तमाशा हमारा 

वो तो करते रहे इंतजार की
हो जाये हम कमजोर कुछ और 
ताकि वो आये आंधी के  बाद में
और उजड़े कारवां को लूट ले

हम भी मानते है की है दोष हमारे कर्मो का
जो ऐसे लोग हमारे अपने हुए
होते जो अच्छे कर्म हमारे
तो इतने बेगाने क्यों हमारे अपने होते

बेगानों ने तो फिर कभी
गाहे बेगाहे दिखाई हमदर्दी हमसे
वो अपने तो पाते ही मौका
हमे हमारी औकात बताते चले गए

फर्क वाकई होता है
अपने अपने होते है बेगाने बेगाने होते है
बेगाने तो वक्त लेते है बनने में अपना
पर अपने तो एक पल में ही बेगाने हो जाते है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

Tuesday, July 27, 2010

BHULAVA (CONFUSION)

भुलावा
होता है मन जब खुश तो
चाहता है उड़ना इतना ऊँचा कि
हर ऊंचाई उसे छोटी लगती है

आती है जब जवानी
लगती है दुनिया इतनी हसीन
कि जिन्दगी बहुत छोटी लगती है

मिलती है कामयाबिया जब
तो लगता है कि कुछ नही मुश्किल
नजदीक हर मंजिल लगती है

मगर यह सचाई नही है जीवन कि
और जब खतम होती है
यह महफ़िल खुशियों की  

तब देखता है इन्सान कि
 दूर कितनी निकल आया हूँ मैं
तो लगता है कि कितनी बेमानी थी ये मस्ती

उपर से चमकती
चकाचोंध करती यह हसीन दुनिया
असल में ये कितनी बदरंग लगती है

जब जाती है गुजर जवानी तो आती है समझ 
सतरंगी इंद्र धनुष तो होता है सिर्फ आसमान में
असल में दुनिया उससे कितनी दूर पड़ती  है
जब टूटता है सपना
 तब पछताता है तूं कि 
बहुत देर से जागा तूं 

अरे ! ये तो छलावा था इंद्र धनुष 
बेकार ही हुआ पागल तूं  पीछे इसके
बेकार ही पीछे इसके भागा तूं 

लगाता  है हिसाब जब तो कहता है मन
बहुत कम पाने के लिए
बहुत कुछ पीछे छोढ़ आया तूं

अब नही होता मुमकिन
लौटना पीछे क्योंकि
बीते हुए कल में कोई जा नही सकता

केवल जीना है तुझे आज में
क्योंकि आने वाले कल को
तूं अभी पा नही सकता

कामयाबी या नाकामयाबी तो है भुलावा मन का
क्या लाया था और क्या ले जायेगा 
ये सब तो है छलावा मन का 

जो दीखता है जो पाया है तूने
यह सब तो बस यही रह जायेगा 
गुजर जायेगा कारवां गुबार देखता रह जायेगा 

इसीलिए तो कहता हूँ
कि मत भटक, जाग   
 उठ और उठके देख 

वरना रह जायेगा कहता कि 
पाछे पछताए होत क्या 
जब चिड़िया चुग गयी खेत II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    
 

Monday, July 26, 2010

RAH APNI APNI (OF OWN WAYS)

राह अपनी अपनी

क्यों मै बताउं तुमे
कि क्या तुमने किया
क्या तुम नही जानती कि
क्या तुमने किया

क्यों हो चाहती तुम कि
बताउं तुम्हे कि मै हूँ  तुमसे खफा
क्यों चाहती हो तुम कि दूं सफाई का मौका तुम्हे
और क्यों न हूँ मै तुमसे खफा

होना खफा या लेना सफाई तुमसे
होगा नए रिश्तो को देना अंजाम
जबकि मै हूँ पहले से ही
तुम्हारे हमारे रिश्तो से परेशान

तुम रही समझती कि
हम समझते कुछ नही
हम रहे समझाते खुद को
कि ऐसा कभी हो सकता नही

तुम हमारे पास रहकर  भी
 दूर रही हमारे दिल से
हमने तुम्हे दिल मै बसाकर
 भी दूर कर दिया खुद  से

तुम खड़ी खड़ी  भी रही
मुढ़ती  पीछे कि ओर
हम झुक नही सके और
बस खड़े खड़े तुम्हे देखते रहे

तुम रहे समझते कि
हम तुम्हे समझते नहीं
हम जानते थे कि तुम्हे
हम जानकर भी जानना चाहते नही

बस इसी तरह चलते चलते
गुजर गए जिन्दगी कि राह से
और फिर तुम अपनी राह चल दी
और मै अपने रास्ते चल दिया II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

 
 
  

HISSAB (ACCOUNT)

हिसाब

लोगो ने मेरा इस्तेमाल किया
इसका दुःख है मुझे
पर तुम देखती रही
इसने मुझे शर्मसार कर दिया

या तो तुम मुझे समझ नही सकी
या मै तुम्हे समझा नही सका
या तुम मुझे अपना नही सकी
या मै तुम्हे अपना बना नही सका

या तो तुम स्वार्थी थी
या मै कमअक्ल था
शायद मै ही कम अक्ल था
क्योंकि आखिर इस्तेमाल तो मै ही हुआ

आखिर मेरा ही हुआ शोषण
आखिर मै ही लुटा
तुम्हारा या किसी और का क्या गया
जो गया मेरा ही गया

मगर अभी खतम कहाँ हुआ है यह तमाशा
अभी तो जिन्दगी बाकि है
फिर मिलेंगे किसी जन्म मै तो करेंगे हिसाब
क्या तुमने पाया और क्या हमारा गया II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Thursday, July 15, 2010

MARYADA SEEMA KI (LIMITATIONS)

मर्यादा सीमा कि  

मत डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

टूट जाती है जब सीमाए वो
तब नहीं रहता डर उसे  किसी बात
उढ़ जाता है वो बनके बादल
बिखर जाता है वो आकाश सा

है अगर डर तो इस डर की वजह भी
यह नाती, सम्बन्धी और रिश्तेदार ही है
उठ जाती जब ऊँगली एक बार समाज की
फिर नहीं डरता इन्सान समाज  से
फिर रहती नहीं परवाह उसे किसी बात की है

बदलते हालात के साथ इन्सान भी बदल जाता है
जाता था डर जो बन्दा नाम से मौत के
उसीका पता हर आते जाते
रह्गुजार से जानना चाहता है

रहता है जब सीमा में अपनी
तब तक ही डर से समाज का व्यवहार होता है
लाँघ जाता है जब यह सीमा अपनी
रहता नहीं कोई मतलब इसका
तब तो बस यह नारी का ही शिंगार होता है

इसीलिए कहता हूँ मै कि
मत   डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी


ARTH (MEANING OR ECONOMY)

अर्थ

आज की दुनिया में होता है
समर्थ में एक बड़ा भाग अर्थ का
पूछता है कौन ज्ञान को उसके और 
बिना अर्थ के लगता है वो व्यर्थ सा

भागता है इन्सान पीछे जिस अर्थ के
क्या वो उस अर्थ का अर्थ भी जानता है
है नहीं होता अर्थ सिर्फ स्वार्थ में
बल्कि होता है अर्थ परमार्थ में भी
क्या इस सच को वो आज पहचानता है

इन्सान जीवन में जब कोई कार्य
निस्वार्थ भाव से करता है
तभी सही मायने में पहचानता है खुद को
और अपने जीवन के अर्थ को सकारथ करता है

है जीवन का अर्थ नहीं है अर्थ कमाना
बल्कि जीवन का अर्थ है परमार्थ कमाना
है परमार्थ का अर्थ है उस परम का अर्थ
उस परम का अर्थ है उसके प्राणियों का कल्याण

यही सच्चा अर्थ है उस अर्थ का
यही सत्य है यही शिव है यही सुंदर है
यही है वो अर्थ जो वासुदेव कुटम्बकम 
की भावना को चिर्तार्थ करता है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी  

MANAV ADHIKAR (HUMAN RIGHTS)

मानव अधिकार

मानव अधिकार की हम
बढ़ी बढ़ी बाते तो खूब करते है
पर खुद को हम क्या
सच्चा मानव कह सकते है

मानव कर्तव्यो की कहीं
देती न बात सुनाई है
हर तरफ बस
मानव अधिकारों की मची दुहाई है

बिना कर्तव्यो के अधिकार की बात तो
जानवर ही कर सकते है
मानव तो अधिकार से पहले
कर्तव्य अपना पूरा करते है

उठाकर बंदूक, चलाकर
 निर्दोष निहत्थो पर गोली
क्या तुम मानवता का कार्य करते हो
अरे ! हमे तो तुम, जानवर से भी बदतर लगते हो

है मानव अधिकार का सच्चा अधिकारी वो मजदूर
जो दिन भर तेज धूप में काम करता है
तब जाकर कहीं वो
अपने परिवार का आधा पेट भरता है

है मानव अधिकार की सच्ची प्रार्थी वो महिला
जो घर से पढ़ने या काम करने को निकलती है
जो बचा बचाकर आंचल अपना
खुद के साये से भी डरती है

है मानव अधिकार की गुहार के लायक वो बच्चे
जो पडे है सडक पर कुपोषण और भूख से बिलखते
कुते को मिलते है बिस्कुट और
 है वो रोटी को भी सिसकते

है मानव अधिकार के काबिल वो युवक
है आत्मा जिनकी देख डिग्री को अपनी
लम्बी सांसे भर्ती है, नहीं मिलती जब नौकरी उनको
तो हररोज उनके अरमानो की चिता जलती है

है मानव अधिकार के जरूरतमन्द वो बूढ़े
जो अकेले पढ़े तन्हाई में रोते है
और बेखबर भावनाओ से उनकी
डाले बाँहों में बाहें अपनी
 उनके बच्चे निश्चिन्त होकर सोते है

मानव अधिकारों की रक्षा के लिए
इधर उधर मत भटक
पहले खुद मानव बन फिर अपने आस पास
सच में  मानव अधिकारों की रक्षा कर

इन मानव रुपी दानवो की हित की बात मत कर
यह नही है इसके काबिल और
देकर सुरक्षा इन हैवानो को
मानव अधिकारों की महत्ता मत कम कर II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

SURAT (CONDITION)

सूरत

कोई भूखा है माया का
कोई भूखा है काया का
और पाना चाहता है नाम कोई
लेकर सहारा राम का

मजहब का कोई ठेकेदार बना
कोई लेकर हथियार निकल चला 
कातिल है जो बेगुनाहों का
हो सकता है क्या वो बंदा खुदा का

त्रिष्नाओ की इस अंधी दौढ़ में
हर कोई शामिल हो चुका है
देकर तिलांजली आदर्शो को
स्वार्थो की अग्नि में झोंक चुका है

हर गली हर चौराहे पर
दुर्योधनो का दरबार सजा है
हररोज इन महफ़िलो में
द्रोपदियो का चीर हरण हो रहा है

महंगाई का बोझ
हर किसी को रुला रहा है
जे पी आन्दोलन की
 याद दिला रहा है

अंग्रेजो ने जब
पाबन्दी नमक पर लगाई थी
तब महात्मा गाँधी ने तब
 दांडी यात्रा करवाई थी

सरकार ने तो
पानी की कीमते है बेतहाशा बढ़ाई
अगली बारी शायद अब
हवा की ही है आई

नशे में उलझा, भौतिक सुखो में उलझा
देश का नौजवान सो रहा है
देख कर दुर्दशा उनकी मजबूर बूढ़ा माँ बाप
जीवन चक्की  में पिसता रो रहा है

हमसे पहले की पीढ़ी ने हमे
महात्मा गाँधी, पटेल, नेहरु और सुभाष
की तस्वीर दिखाई थी
हमने भी तुम्हे
जे पी और विनोबा भावे की कथा सुनाई थी   

पर   झूठी उन्नति की कामना ने
हमारी आँख पर पट्टी चढ़ाई थी
लेकर बोफोर्स, चारा घोटाला, ताबूत घोटाला
हमने उसकी कीमत चुकाई थी

मगर कह सकते है हम की
देकर बलिदान श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भगत सिंह
अपनी समाधि में सोते है

वो बात दीगर है की
कुछ लोग अब भी जाकर
जिन्ना की मजार पर रोते है

अरे ! आज के नौजवानों सोचो
क्या दोगे जवाब तुम अपनी आने वाली पीढ़ी को
जब लुट रहा था देश तब क्या सो रहे थे तुम
सुलगा के नशे की बीढ़ी को

सुन लो तुम भी कुछ गुमराह  नौजवानों
की माना की बदलना हालात आसान नहीं है
पर उठाकर हथियार करना कत्ले आम
यह भी तो कोई समाधान नहीं है

इस तरह तो जनता दोनों तरफ से पिसती है
एक तरफ मारते है नक्सलवादी तो
दूसरी तरफ पुलिस परेशान करती है

महात्मा गाँधी ने भारत के इतहास में
लढ़ी सबसे बढ़ी लढ़ाई  थी मगर क्या कभी
उन्होंने एक भी गोली चलाई थी

माना की फोढ़कर बम्ब
भगत सिंह ने असेम्बली हिलाई थी
मगर क्या किसी निर्दोष ने कभी उनके हाथो
अपनी जान गवाई थी  

कहता नहीं हूँ की
रखके हाथ पर हाथ बैठे रहो
यह भी नहीं कहता की
चुपचाप जुल्म को सहते रहो

करना तो तुम्हे ही होगा
क्योंकि तुम्ही हमारी आशा हो
कैसा होगा इस देश का भविष्य
इसकी तुम परिभाषा हो

होना होगा परिपक्व इतना तुम्हे की
तुम्हे कोई बहका न पाए
उठाकर फ़ायदा किसी कमजोरी का तुम्हारी
कमजोर हमें बना न जाये

बहादुर, समझदार और देश भक्त
हो नौजवान इस देश का
इसकी बहुत जरूरत है
उज्वल हो भविष्य इस देश का
इसकी यही बस एक सूरत है II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   
    
 

Wednesday, July 14, 2010

HUL (SOLUTION)

हल
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में बिखरे है
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
करके याद उन सपनो को
मै खुद ही सहम जाता हूँ

नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी
आशा के गीत गुनगुनाये थे
करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ

नही चाहता की मिले आँखे
मेरी उन आँखों से क्योंकि
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
उन सवालों के जवाब
 मै खुद को नहीं दे पाता हूँ

और इस तरह घबराकर मै
 फेंककर तोढ़ देता हूँ  आइना
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकढ़ो में
 मै अब भी उसी चेहरे को ही मौजूद पाता हूँ

अब आता समझ की नहीं है
 हल भागना किसी समस्या का
समेटकर उन टुकढ़ो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   
 
  

ANT (END)

अंत
स्वार्थ से भरी बात  है
जैसे अँधेरे  में  रस्सी सा लगे सांप
इस रस्सी से जो दूसरो को बांधने जाता है
यह सांप उसी को लिपट जाता है

होता है जहर तीखा इतना इस सांप का
 कि फिर इन्सान को  अच्छे बुरे का
ध्यान ही कहाँ रह जाता है

मै, मेरा, अपना और पराये के
इस जाल में बुरी तरह उलझ जाता है
जलाकर कामनाओ कि आग मन में
यह इन्सान को पथ भ्रष्ट कर जाता है

नही सोचता इन्सान कि
जब देगा महत्व हर कोई स्वार्थ को अपने तो
तो समाज भला कहाँ जायेगा
क्यों देगी माँ दूध बच्चे को
क्यों पिता बच्चे पर लाढ लुटायेगा

इसी लिए तो  कहते है कि
निस्वार्थ पवन सा बहना सीखो
बरसों बनकर मेघ सावन के
औरो कि प्यास भुझाना सीखो

जानते हो कि स्वार्थो का यह फंदा
आखिर तुम्हे कहाँ ले जायेगा
बाद मरने के जब जलायेगे तुझे तेरे अपने
तब समझेगा तू कि पंचभूत का शरीर था यह तो
 होकर नष्ट प्रकृति में ही  मिल जायेगा  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

Wednesday, July 7, 2010

NADAN BALAK (NAUGHTY CHILD)

नादान बालक
चारो तरफ की हवाएं मैली हो चुकी है
पानी की रंगत मटमैली हो चुकी है
हो गई है कढ़वी गंडेरिया
गंगा की धार अब मैली हो चुकी है

हो चुका है इतना  दोहन माँ वसुंधरा का
की माँ की छाती अब खाली हो चुकी है
कर दिया है तार तार आंचल इतना माँ का (OZONE LAYER)
की छनती थी सूर्य की किरने वहां से
वो किरने अब कसैली हो चुकी है

कभी गलाकर खुद को
यह हिम शिलाए देती थी
पानी की संजीवनी इन्सान को
वोही धार अब बनकर बाढ़
कैसी तूफानी हो चुकी है

ऐ ! धरती पुत्रो
माँ का इशारा समझो अब तो
बनकर नादान मत नोचो उसको
समझो कुछ फर्ज अपना भी
कर दो फिर से हरा भरा
माँ  वसुंधरा  के  आँचल को
कही फट गयी गुस्से से माँ
मत कहना फिर यह की नहीं था पता हमको
की माँ इतनी विषैली हो चुकी है II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी 


  

Monday, July 5, 2010

SAKOON (A LITTLE SATISFACTION)

सकून

मै कैसे शामिल होता ख़ुशी मै तुम्हारी
जब की तुम कभी
गम मै भी मेरे शामिल नहीं हुए

देख कर खुश तुम्हे क्यों आये
 आंसू ख़ुशी के आँखों मै हमारी 
जबकि हमारे जीवन के इतने गमो को 
कभी तुम्हारी आंख के आंसू  हासिल न हुए 

जब न जलता था चूल्हा घर मै मेरे 
तुम अपने आंगन में
 घी के दिए जलाते थे

गाते थे तराने हम जब गम के   
तब होठ तुम्हारे 
ख़ुशी के गीत गुनगुनाते थे 

मगर जब बदली फिजायें 
तब क्यों चाहते थे तुम
की खढ़े रहे हम साथ तुम्हारे 

मगर तुम्हारे गम से न खुश हूँ न उदास हूँ 
न दूर हूँ न पास हूँ क्योंकि 
कोई रिश्ता नही समझता मै बीच हमारे 

यह दूरियां बनाई है तुमने 
निभाई है हमने और बन गए है
 अब हम नदी के दो किनारे

अब होंगे आमने सामने हम 
पर मिल नहीं पाएंगे होगा मगर
होगा यह सकून की हो तुम सामने हमारे II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी