अंत
स्वार्थ से भरी बात है
जैसे अँधेरे में रस्सी सा लगे सांप
इस रस्सी से जो दूसरो को बांधने जाता है
यह सांप उसी को लिपट जाता है
होता है जहर तीखा इतना इस सांप का
कि फिर इन्सान को अच्छे बुरे का
ध्यान ही कहाँ रह जाता है
मै, मेरा, अपना और पराये के
इस जाल में बुरी तरह उलझ जाता है
जलाकर कामनाओ कि आग मन में
यह इन्सान को पथ भ्रष्ट कर जाता है
नही सोचता इन्सान कि
जब देगा महत्व हर कोई स्वार्थ को अपने तो
तो समाज भला कहाँ जायेगा
क्यों देगी माँ दूध बच्चे को
क्यों पिता बच्चे पर लाढ लुटायेगा
इसी लिए तो कहते है कि
निस्वार्थ पवन सा बहना सीखो
बरसों बनकर मेघ सावन के
औरो कि प्यास भुझाना सीखो
जानते हो कि स्वार्थो का यह फंदा
आखिर तुम्हे कहाँ ले जायेगा
बाद मरने के जब जलायेगे तुझे तेरे अपने
तब समझेगा तू कि पंचभूत का शरीर था यह तो
होकर नष्ट प्रकृति में ही मिल जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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