Thursday, July 15, 2010

MARYADA SEEMA KI (LIMITATIONS)

मर्यादा सीमा कि  

मत डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

टूट जाती है जब सीमाए वो
तब नहीं रहता डर उसे  किसी बात
उढ़ जाता है वो बनके बादल
बिखर जाता है वो आकाश सा

है अगर डर तो इस डर की वजह भी
यह नाती, सम्बन्धी और रिश्तेदार ही है
उठ जाती जब ऊँगली एक बार समाज की
फिर नहीं डरता इन्सान समाज  से
फिर रहती नहीं परवाह उसे किसी बात की है

बदलते हालात के साथ इन्सान भी बदल जाता है
जाता था डर जो बन्दा नाम से मौत के
उसीका पता हर आते जाते
रह्गुजार से जानना चाहता है

रहता है जब सीमा में अपनी
तब तक ही डर से समाज का व्यवहार होता है
लाँघ जाता है जब यह सीमा अपनी
रहता नहीं कोई मतलब इसका
तब तो बस यह नारी का ही शिंगार होता है

इसीलिए कहता हूँ मै कि
मत   डराओ इतना की
डर हद से गुजर जाये
कही ऐसा न हो की
जिन्दगी मौत से सिहर जाये

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी


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