मानव अधिकार
मानव अधिकार की हम
बढ़ी बढ़ी बाते तो खूब करते है
पर खुद को हम क्या
सच्चा मानव कह सकते है
मानव कर्तव्यो की कहीं
देती न बात सुनाई है
हर तरफ बस
मानव अधिकारों की मची दुहाई है
बिना कर्तव्यो के अधिकार की बात तो
जानवर ही कर सकते है
मानव तो अधिकार से पहले
कर्तव्य अपना पूरा करते है
उठाकर बंदूक, चलाकर
निर्दोष निहत्थो पर गोली
क्या तुम मानवता का कार्य करते हो
अरे ! हमे तो तुम, जानवर से भी बदतर लगते हो
है मानव अधिकार का सच्चा अधिकारी वो मजदूर
जो दिन भर तेज धूप में काम करता है
तब जाकर कहीं वो
अपने परिवार का आधा पेट भरता है
है मानव अधिकार की सच्ची प्रार्थी वो महिला
जो घर से पढ़ने या काम करने को निकलती है
जो बचा बचाकर आंचल अपना
खुद के साये से भी डरती है
है मानव अधिकार की गुहार के लायक वो बच्चे
जो पडे है सडक पर कुपोषण और भूख से बिलखते
कुते को मिलते है बिस्कुट और
है वो रोटी को भी सिसकते
है मानव अधिकार के काबिल वो युवक
है आत्मा जिनकी देख डिग्री को अपनी
लम्बी सांसे भर्ती है, नहीं मिलती जब नौकरी उनको
तो हररोज उनके अरमानो की चिता जलती है
है मानव अधिकार के जरूरतमन्द वो बूढ़े
जो अकेले पढ़े तन्हाई में रोते है
और बेखबर भावनाओ से उनकी
डाले बाँहों में बाहें अपनी
उनके बच्चे निश्चिन्त होकर सोते है
मानव अधिकारों की रक्षा के लिए
इधर उधर मत भटक
पहले खुद मानव बन फिर अपने आस पास
सच में मानव अधिकारों की रक्षा कर
इन मानव रुपी दानवो की हित की बात मत कर
यह नही है इसके काबिल और
देकर सुरक्षा इन हैवानो को
मानव अधिकारों की महत्ता मत कम कर II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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