नादान बालक
चारो तरफ की हवाएं मैली हो चुकी है
पानी की रंगत मटमैली हो चुकी है
हो गई है कढ़वी गंडेरिया
गंगा की धार अब मैली हो चुकी है
हो चुका है इतना दोहन माँ वसुंधरा का
की माँ की छाती अब खाली हो चुकी है
कर दिया है तार तार आंचल इतना माँ का (OZONE LAYER)
की छनती थी सूर्य की किरने वहां से
वो किरने अब कसैली हो चुकी है
कभी गलाकर खुद को
यह हिम शिलाए देती थी
पानी की संजीवनी इन्सान को
वोही धार अब बनकर बाढ़
कैसी तूफानी हो चुकी है
ऐ ! धरती पुत्रो
माँ का इशारा समझो अब तो
बनकर नादान मत नोचो उसको
समझो कुछ फर्ज अपना भी
कर दो फिर से हरा भरा
माँ वसुंधरा के आँचल को
कही फट गयी गुस्से से माँ
मत कहना फिर यह की नहीं था पता हमको
की माँ इतनी विषैली हो चुकी है II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment