अर्थ
आज की दुनिया में होता है
समर्थ में एक बड़ा भाग अर्थ का
पूछता है कौन ज्ञान को उसके और
बिना अर्थ के लगता है वो व्यर्थ सा
भागता है इन्सान पीछे जिस अर्थ के
क्या वो उस अर्थ का अर्थ भी जानता है
है नहीं होता अर्थ सिर्फ स्वार्थ में
बल्कि होता है अर्थ परमार्थ में भी
क्या इस सच को वो आज पहचानता है
इन्सान जीवन में जब कोई कार्य
निस्वार्थ भाव से करता है
तभी सही मायने में पहचानता है खुद को
और अपने जीवन के अर्थ को सकारथ करता है
है जीवन का अर्थ नहीं है अर्थ कमाना
बल्कि जीवन का अर्थ है परमार्थ कमाना
है परमार्थ का अर्थ है उस परम का अर्थ
उस परम का अर्थ है उसके प्राणियों का कल्याण
यही सच्चा अर्थ है उस अर्थ का
यही सत्य है यही शिव है यही सुंदर है
यही है वो अर्थ जो वासुदेव कुटम्बकम
की भावना को चिर्तार्थ करता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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