फर्क
ये दर्द अगर बेगाने देते
तो शायद हम सह भी जाते,
मगर क्या करे ये दर्द तो दिए है अपनों ने
जिसे हम किसी से कह भी नही पाते
बाहर वाले तो देकर जख्म
फिर भी छोड़ देते है मगर
अपने आकर उसे कुरेदकर
उसमे नमक भर जाते है
अगर थामी होती बढ़कर
अपनों ने वक्त पर बांह हमारी
तो क्या मजाल थी
उस वक्त कि आंधी कि
हमारी खुशिया यू उढ़ा ले जाती
दर्प दम्ब और गर्व से भरे
वो अपने आये और
बताकर कुछ दोष हमारा
और कुछ दोष कर्मो का चले गए
कुछ तो इतने अपने थे कि
उन्होंने आने कि जहमत भी की नही
वो खड़े रहे दूर और
देखते रहे तमाशा हमारा
वो तो करते रहे इंतजार की
हो जाये हम कमजोर कुछ और
ताकि वो आये आंधी के बाद में
और उजड़े कारवां को लूट ले
हम भी मानते है की है दोष हमारे कर्मो का
जो ऐसे लोग हमारे अपने हुए
होते जो अच्छे कर्म हमारे
तो इतने बेगाने क्यों हमारे अपने होते
बेगानों ने तो फिर कभी
गाहे बेगाहे दिखाई हमदर्दी हमसे
वो अपने तो पाते ही मौका
हमे हमारी औकात बताते चले गए
फर्क वाकई होता है
अपने अपने होते है बेगाने बेगाने होते है
बेगाने तो वक्त लेते है बनने में अपना
पर अपने तो एक पल में ही बेगाने हो जाते है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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