सूरत
कोई भूखा है माया का
कोई भूखा है काया का
और पाना चाहता है नाम कोई
लेकर सहारा राम का
मजहब का कोई ठेकेदार बना
कोई लेकर हथियार निकल चला
कातिल है जो बेगुनाहों का
हो सकता है क्या वो बंदा खुदा का
त्रिष्नाओ की इस अंधी दौढ़ में
हर कोई शामिल हो चुका है
देकर तिलांजली आदर्शो को
स्वार्थो की अग्नि में झोंक चुका है
हर गली हर चौराहे पर
दुर्योधनो का दरबार सजा है
हररोज इन महफ़िलो में
द्रोपदियो का चीर हरण हो रहा है
महंगाई का बोझ
हर किसी को रुला रहा है
जे पी आन्दोलन की
याद दिला रहा है
अंग्रेजो ने जब
पाबन्दी नमक पर लगाई थी
तब महात्मा गाँधी ने तब
दांडी यात्रा करवाई थी
सरकार ने तो
पानी की कीमते है बेतहाशा बढ़ाई
अगली बारी शायद अब
हवा की ही है आई
नशे में उलझा, भौतिक सुखो में उलझा
देश का नौजवान सो रहा है
देख कर दुर्दशा उनकी मजबूर बूढ़ा माँ बाप
जीवन चक्की में पिसता रो रहा है
हमसे पहले की पीढ़ी ने हमे
महात्मा गाँधी, पटेल, नेहरु और सुभाष
की तस्वीर दिखाई थी
हमने भी तुम्हे
जे पी और विनोबा भावे की कथा सुनाई थी
पर झूठी उन्नति की कामना ने
हमारी आँख पर पट्टी चढ़ाई थी
लेकर बोफोर्स, चारा घोटाला, ताबूत घोटाला
हमने उसकी कीमत चुकाई थी
मगर कह सकते है हम की
देकर बलिदान श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भगत सिंह
अपनी समाधि में सोते है
वो बात दीगर है की
कुछ लोग अब भी जाकर
जिन्ना की मजार पर रोते है
अरे ! आज के नौजवानों सोचो
क्या दोगे जवाब तुम अपनी आने वाली पीढ़ी को
जब लुट रहा था देश तब क्या सो रहे थे तुम
सुलगा के नशे की बीढ़ी को
सुन लो तुम भी कुछ गुमराह नौजवानों
की माना की बदलना हालात आसान नहीं है
पर उठाकर हथियार करना कत्ले आम
यह भी तो कोई समाधान नहीं है
इस तरह तो जनता दोनों तरफ से पिसती है
एक तरफ मारते है नक्सलवादी तो
दूसरी तरफ पुलिस परेशान करती है
महात्मा गाँधी ने भारत के इतहास में
लढ़ी सबसे बढ़ी लढ़ाई थी मगर क्या कभी
उन्होंने एक भी गोली चलाई थी
माना की फोढ़कर बम्ब
भगत सिंह ने असेम्बली हिलाई थी
मगर क्या किसी निर्दोष ने कभी उनके हाथो
अपनी जान गवाई थी
कहता नहीं हूँ की
रखके हाथ पर हाथ बैठे रहो
यह भी नहीं कहता की
चुपचाप जुल्म को सहते रहो
करना तो तुम्हे ही होगा
क्योंकि तुम्ही हमारी आशा हो
कैसा होगा इस देश का भविष्य
इसकी तुम परिभाषा हो
होना होगा परिपक्व इतना तुम्हे की
तुम्हे कोई बहका न पाए
उठाकर फ़ायदा किसी कमजोरी का तुम्हारी
कमजोर हमें बना न जाये
बहादुर, समझदार और देश भक्त
हो नौजवान इस देश का
इसकी बहुत जरूरत है
उज्वल हो भविष्य इस देश का
इसकी यही बस एक सूरत है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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