सकून
मै कैसे शामिल होता ख़ुशी मै तुम्हारी
जब की तुम कभी
गम मै भी मेरे शामिल नहीं हुए
देख कर खुश तुम्हे क्यों आये
आंसू ख़ुशी के आँखों मै हमारी
जबकि हमारे जीवन के इतने गमो को
कभी तुम्हारी आंख के आंसू हासिल न हुए
जब न जलता था चूल्हा घर मै मेरे
तुम अपने आंगन में
घी के दिए जलाते थे
गाते थे तराने हम जब गम के
तब होठ तुम्हारे
ख़ुशी के गीत गुनगुनाते थे
मगर जब बदली फिजायें
तब क्यों चाहते थे तुम
की खढ़े रहे हम साथ तुम्हारे
मगर तुम्हारे गम से न खुश हूँ न उदास हूँ
न दूर हूँ न पास हूँ क्योंकि
कोई रिश्ता नही समझता मै बीच हमारे
यह दूरियां बनाई है तुमने
निभाई है हमने और बन गए है
अब हम नदी के दो किनारे
अब होंगे आमने सामने हम
पर मिल नहीं पाएंगे होगा मगर
होगा यह सकून की हो तुम सामने हमारे II
लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी
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