Wednesday, June 30, 2010

KHOON KE GHOONT

खून के घूँट

कहते है की जब मालिक ने बनाई दुनिया
उसे भी बहुत परेशानी आयी थी
जब बांटी जिन्दगी उसने तब
उसकी नीति भी इंसान को कहाँ भायी  थी

हुआ जब बंटवारा उम्र का
गधे की बारी सबसे पहले आई थी
पूछा जब मालिक ने उससे तो
वर्ष सौ पर उसने गर्दन हिलाई थी

फिर आयी जब  बारी कुते की
तो उसने भी वर्ष सौ पर दुम हिलाई थी
फिर बुलाया जब उल्लू  को तो
उसने भी सौ पर आँख घुमाई थी

फिर आया इंसान लगा जब पता उसको
की सिर्फ पचीस वर्ष की उम्र ही उसके हिस्से आई थी
भला कैसे करता बर्दाश्त वो इसको
खूब उसने मचाई दुहाई थी

आया तरस भगवान को उसपर और
बुला गधे को उसकी मति घुमाई थी
घटाकर पच्चीस वर्ष उम्र उसकी
इंसान की उम्र बढ़ाई थी

फिर बुला कुते और उल्लु को
वही नीति अपनाई थी
हो गयी उम्र इंसान की वर्ष सौ
बाकी सबकी उम्र घटाई थी

कहते है की है उम्र अपनी वर्ष 25 इंसान की
बाकी उसकी उम्र है उधार की
रहता है वो इंसान पच्चीस तक
बाकी उम्र है बेकार की

पच्चीस से पचास तक है ढोता
वो बोझा सारे परिवार  का
लगता है वो गधा तब और
होता नही है उसमे लक्षण कोई इंसान का

बीच 50 से 75 के हो जाती है कम ताकत उसकी
और होती नही किसी को जरूरत उसके साथ की
लगता है हर को वो भौंकता कुते सा
लगती है हर बात उसकी सबको बकवास सी

पचहतर से सौ तक तो होता गजब है
समझ जाता है वो की
अरे, ये तो दुनिया अजब  है

जिस घर के लिए उसने पूरी उम्र गवाई थी
अब उन्ही घरवालो ने घर के बाहर
खटिया उसकी बिछाई थी

रात को भी वो उल्लू सा जागता रहता  था
रह रहकर देखता था उपर को
और असमान की तरफ ताकता रहता  था

करता है गिला ईश्वर से क्यों आपने
गधे, कुते और उल्लू की मति घुमाई थी
घटाकर उम्र उनकी क्यों इंसान की उम्र बढ़ाई थी

चाहें मै  कम जीता
पर इन्सान की तरह तो जीता
बनता सर्वश्रेष्ठ रचना तुम्हारी
पर इस तरह खून के घूँट तो न पीता II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी

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