Tuesday, July 27, 2010

BHULAVA (CONFUSION)

भुलावा
होता है मन जब खुश तो
चाहता है उड़ना इतना ऊँचा कि
हर ऊंचाई उसे छोटी लगती है

आती है जब जवानी
लगती है दुनिया इतनी हसीन
कि जिन्दगी बहुत छोटी लगती है

मिलती है कामयाबिया जब
तो लगता है कि कुछ नही मुश्किल
नजदीक हर मंजिल लगती है

मगर यह सचाई नही है जीवन कि
और जब खतम होती है
यह महफ़िल खुशियों की  

तब देखता है इन्सान कि
 दूर कितनी निकल आया हूँ मैं
तो लगता है कि कितनी बेमानी थी ये मस्ती

उपर से चमकती
चकाचोंध करती यह हसीन दुनिया
असल में ये कितनी बदरंग लगती है

जब जाती है गुजर जवानी तो आती है समझ 
सतरंगी इंद्र धनुष तो होता है सिर्फ आसमान में
असल में दुनिया उससे कितनी दूर पड़ती  है
जब टूटता है सपना
 तब पछताता है तूं कि 
बहुत देर से जागा तूं 

अरे ! ये तो छलावा था इंद्र धनुष 
बेकार ही हुआ पागल तूं  पीछे इसके
बेकार ही पीछे इसके भागा तूं 

लगाता  है हिसाब जब तो कहता है मन
बहुत कम पाने के लिए
बहुत कुछ पीछे छोढ़ आया तूं

अब नही होता मुमकिन
लौटना पीछे क्योंकि
बीते हुए कल में कोई जा नही सकता

केवल जीना है तुझे आज में
क्योंकि आने वाले कल को
तूं अभी पा नही सकता

कामयाबी या नाकामयाबी तो है भुलावा मन का
क्या लाया था और क्या ले जायेगा 
ये सब तो है छलावा मन का 

जो दीखता है जो पाया है तूने
यह सब तो बस यही रह जायेगा 
गुजर जायेगा कारवां गुबार देखता रह जायेगा 

इसीलिए तो कहता हूँ
कि मत भटक, जाग   
 उठ और उठके देख 

वरना रह जायेगा कहता कि 
पाछे पछताए होत क्या 
जब चिड़िया चुग गयी खेत II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    
 

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