Saturday, June 19, 2010

DURR (FEAR)

डर
ठिठक कर क्यों ठहर गयी हो
क्या सोच कर सहम गयी हो
गर्मी की इस तपती दोपहर में
क्या देखकर सिहर गयी हो

कभी एक स्पर्श से फैलती थी सिहरन
अब बाँहों में आकर क्यों बिखर गयी हो
भावनाओ का है बुद्धि से  नाता गहरा
वर्ना तुम थी जो तुम तो वही हो

वफ़ा तुम्हारी फितरत न थी
बेवफाई हमारी आदत न थी
न तुम बदले न हम बदले
हम भी वही है तुम भी वही हो

कुदरत ने बदली फिजाये
वक़्त ने बदली दिशाए
जब नहीं डरते अपने अंजाम से हम
तो हमारे अंजाम से तुम क्यों डरी हुई हो

मत घबराओ तुम और हमसे
न घबराए हम और तुमसे
ये जीवन तो है भोग कर्मो का
फिर बाद उसके हम कहीं है तुम कहीं हो  II

लेखक   प्रवीण चन्द्र झांझी
   

1 comment:

  1. tumhe apn andar hjakne ke aur khud ko sudharne ke bade zarurat hai..

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