Friday, June 18, 2010

BADLAV (CHANGE)

बदलाव

भावनाओ की आंधी के संग
उढ़ चले कुछ रिश्तो के कण
आकर इंसान की आँखों में चिपक गए

न चाहकर भी है झेलना पढ़ता उनको 
क्योंकि नाजुक है बहुत वो अंग 
क्या होगा अगर वो जख्म नासूर में बदल गए 

अक्सर बहकर वासना की लहरों पर इंसान 
 ढूँढता है बाद निकल जाने के तूफ़ान
की उसके सिदान्तो के अवशेष कहाँ  गए 

कमजोर शणो में ही होती है 
परीक्षा इंसान के सयम की 
वर्ना तो कई योगी भोगी बनकर बिखर गए 

हो जाये अगर कभी गल्ती
तो उस गल्ती तो जीवन भर मत ढोना
ऐसा करना की आगे की सुधर जाये 

कई बार है जलता, कई बार है तपता सोना 
ताकि वो जलकर और तपकर वो सोना 
आखिर कुंदन में बदल सके

चलकर इन टेढ़े मेढ़े रास्तो पर जीवन के 
 समझ पाता है मानव की कैसे वो बदले खुद को 
ताकि वो अंत में आखिर अपनी मंजिल पर पहुंच सके II

लेखक  प्रवीण चन्द्र झांझी  

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